Sunday, June 05, 2005

Iran-Pak-India gas pipeline project - KEEP OUT USA!

Damn, I am confused – I don’t want to be happy yet – this cannot be true, I love this pessimism – I am comfortable settled in it! Right now in the pants of my mind, “what the heck” is reaching the levels of “what the F&$*”!! What is going on really?

Wait a min! … Are our politicians brewing the perfect recipe for unrest in the region again? Are India and Pak serious? REALLY talking about our national interests without America’s consent? Wow, are there symptoms of us hitting our diplomatic age of puberty? Un-‘F’-ING-believable! This cannot be true!!

USA Inc., the control freak it is, wants its share in everything traded on the globe. Either some American corporate has to be involved via its technology or services or products or some other form of making money. Any trade any level –period.

America is especially interested in Energy, Banking and Conglomerates. Weapons? Hmm – we don’t trade them in malls – right. On a bigger army level –that’s on the top of the list!

How can a $4bn ENERGY deal go in Asia without the consent and Involvement of USA!

Ideally how this should have been done? Les see - After Iraq, USA would attack Iran (on the basis of same ‘old WMD bullsh!t), then America will have all of Iran’s oil too and American companeis would built the pipeline on our lands, Shell gas stations in out neighbourhoods and India, Pak would become its perfect markets! Everybody is happy – right!! Now big brother is getting pissed – for all the good reasons and sh!t will hit the fan!!!

India is getting ready for Iran-Pak-India gas pipeline project – This deal does not fit the bigger American plan! Though this news may be music to many ears, what happened to Desi-Paki puppets dance on the American country music tunes! Traditionally, in our part of the world politicians trade national interests for power quicker than the prostitutes trade their flash for money. This project has been in discussions for decades but nothing materialized simple because India and Pakistan were busy kicking each other’s balls!

If this project materializes, it can bring these nations together and can be as important as out historic trade routes – America for sure won’t like to see that happen!

An inforamtive article about India’s oil demand & supply

America has not been happy about all this, India has not buzzed so far!

As soon as some proxy peace (hey if there can be proxy war, there can be proxy peace too!) India offered to sell diesel to Pakistan on discounted price, this is a big diplomatic initiative. Finally, a well awaited the recent google news which inspired this post

Is this possible? Can we do this? If we fail to materialize this project and USA ends up doing what we want to do on our own – It would give us one more reason to hate USA and that’s about it, we will end up becoming a market instead of a project partner. I am afraid that may happen!

Thursday, May 26, 2005


Truth and fact, perspective and reality, hope and denial, justice and revenge; I can keep going. Things are not what they appear to be.

Comfort zones, that’s what we create; Rational comfort zones, we kind of prefabricate them for our own ease. I go ahead and have fun pretending to philosophize, nothing but rearranging the words, sometimes wondering how easy it is to use words as tools to create "social comfort zones". Simple renaming does miracles, when gambling becomes gaming the associated sense of guilt fades away.

If I was a novelist I could have written something with the title “Let them die in their comfort zone(s)” – I think it’s a fun title. To me “Let them live in their comfort zone(s)” is a more sinful thought – it does not feel good on many levels - what if they live forever! Or perhaps it is my hidden sadistic side, which would not like to see them in their comfort zone, mind plays its trick and I feel better violating the zone! Its fun to bullshit like this!!

Pushing buttons is what it is called. Purpose? Making them uncomfortable about something? Not really, the real purpose is to get some attention. Why analyze? It is quite simple actually.

“Let the die in their comfort zone” is for sure a better title for a book – leave them alone till death. Leave them with their perspectives, with their hopes and with their prejudices. Know in your heart that finally they will be free – in a natural course, sometime on the timeline – without knowing the difference or its knowledge.

I know this is quite impressionistic; I have had my fare share of realism for the day anyways! f@#* This one is the worst ever!

Sunday, March 27, 2005

ई-स्वामी की ई-छप्पर

मालवीमानुस आलसी नही होते, आरामपसंद होते हैं. आलसी के पास काम होता है और वो करता नही, हम काम पैदा ही ना हो इस योग के साधक हैं - निष्काम-योग की परिभाषा मालवी संस्कृती जरा अलग तरीके से समझी है. अब क्या करें साहब, बम्मन लोगों ने संस्कृत के पेटेंट ले कर सब गडबड कर रखा था ना.

लोकल संतन का कथन है - फिरी का चंदन घिस मेरे नंदन, सो, हम blogspot पर कई मौसम पडे रहे, आगे भी पडे रह सकते थे चाहते तो और अतिक्रमण भी कर सकते थे! मगर अब हम अच्छी लोकेलिटी में रह कर अभिजात्य हुआ चाहते है, वैसे ये पता पुश्तैनी रेफ़रंस जैसा संभाल के रखेंगे - जैसे हमरे दादा जी दूसरे बुजुर्गों को वो हमेशां किस पिण्ड(गांव) से है, बताते थे!

ई-स्टोरी ये है की, जैसे-तैसे हिंदिनी के पिछवाडे फ़िलहाल एक छप्पर अपने लिए भी तान दिये हैं, तो अब वहीं मिलेंगे! रस्ता है इधर से.

Saturday, March 12, 2005

बेचारा लल्लू!

पुरुष और स्त्री अलग अलग प्रकार के जीव हैं और दोनों एक दूसरे की खोपडी की कार्यप्रणाली समझ सकें इस लिए हजारों पुस्तकें उपलब्ध हैं - ठीक है साहब, अगर प्रेम कम है और दिल का काम दिमाग से ही लिया जाना है तो किताब पढ कर निभा लो.

अब इधर समान अधिकार पाने के मामले में पश्चिमी कोमलांगियाँ साक्षात रणचण्डी की प्रतिमूर्ती होती हैं - लिंग-भेद कानूनन अपराध है मगर जेंडर-प्रोफाईलिंग या लिंगाधारित विभेदन जोरदार होता है - विसंगतियाँ आह-और-वाह सी साथ साथ बहती हैं. तो स्त्री पुरुष अलग अलग प्रकार के जीव हैं वो कोमल हैं और संवेदनशील भी और हम अपरिष्कृत ढीठ हैं - धन्यवाद! मगर मरद की मजाल जो "अपवाद भी तो होते हैं" इतना भी बोल कर भाग पडे! अब १८-२५ साल की उम्र का पुरुष ज्यादा कार इन्शोरेंस दर देता है तब कोई स्त्री आ कर नही कहती की भई हम भी तेज भगाते हैं और सेल फ़ोन पे खी-खी करते हैं!

स्त्रीत्व का रंग गुलाबी है अगर पुरुष गुलाबी रंग पहन ले - हा-हा-कार! स्त्री भावुक फिल्में ही पसंद करती हैं और पुरुष मारपिटाई वाली, फ़ाडू-डरावनी-भूतहा, फुटबाल-सिरफुटव्वल-बाक्सिंग इत्यादी. चलो सिनेमा तक ठीक है की आप चहे जो हांक लो पर इधर और हजारों तरीके हैं जेंडर प्रोफ़ाईलिंग के जिनमे से लगभग सारे ही पुरुषों के ही खिलाफ़ जाते हैं!

हकीकत - सब बकवास बात है, आम तौर पे जितनी डरावनी पश्चिम की नारी होती है या पश्चिमीकृत भारतीय मूल की बालाएं होती हैं शायाद ही कोई और जीव होता हो. समाज नही है जसपाल भट्टी के उल्टा-पुल्टा का सीधा प्रसारण है साला! पर यार पुरुष भी ना, स्त्री-पुरुष संबंधों के मामले में कई काठ के उल्लू तो बहुत ही खुन्नस दिला देते हैं कसम से अब इन डायनिकाओं को भी पूरा दोष नही लगा सकते! एक केस स्टडी लो -

हाल ही में अँतर्यामिणी की मित्रता एक ऐसी ही डायनिका से हो गई है. वो हमारे यहाँ दो दिन के लिए सपति पधारीं - अब तक इस भारतीय एच-4 धारीणीं और उसके लल्लू मिय़ाँ द्वारा हमारे घर में उनकी आपसी चुम्मा-चाटी, गलबहिंयाँ डाले ही बैठना, पतीदास द्वारा पत्नी के पैर दबाना - फुट-मसाज देने के नाम पर इत्यादी क्रिया कलाप देख चुका हूँ. प्रेम का सार्वजनिक प्रदर्शन चल रहा है - बढिया है. भई आपसी सेवा होनी चाहिए. पत्नी के पैर दुख रहे हैं या नही पर् पति दबा रहा है - सुंदर दृश्य हो सकता है पत्नी पति की गोद में पैर रख के लेटी है, और वो फ़ुट मसाज दे रहा है इधर हम बैठे हैं नजारा देख रहे हैं - देखो इसे बोलते हैं आत्मसमर्पण! मुझे भी ना पता नही कैसे कैसे असमय विचार आते हैं, याद आ रहा है अगर किसी जीव को अनजाने पैर लग जाता था तो हमारे गाँव मे छू कर माफी माँग ली जाती थी, चलिए पति-पत्नी अलग मामला रहा और माना आप हमें इतना अपना मान रहे हैं की हमारा घर भी अपना लग रहा है अहोभाग्य अतिथिदेव-देवी परन्तु आखिर इस प्रेम-प्रदर्शन की सीमा रेखा क्या है? खयाल आया और आ कर चला गया. पैर दबते रहे - कोडेक मोमेंट, कैसे खीँचू और जवान के बाप को पहुचाउँ वाह बाउजी क्या प्रेमी सँतानें हैं कसम से - जहां जाती हैं प्रेम करती हैं.

मैडम की बातें, इन को लोगों को एनालाईज़ करने का शौक है, अभी एच-4 पे काम नही कर सकती हैं. अपने आस-पास के लोगों पर राय प्रकट करती हैं लल्लूपति निहाल हैं इनकी इस काबिलियत पर, बताते हैं दफ्तर का कोई भी निर्णय मैडम से पूछे बिना नही लेते - इस को बोलते हैं सहचारिणीं. मैडम दियाँ गल्लाँ, ये हर एक से ऊपर हैं - एमबीए कर के आई हैं. जय हो! जय हो!! अपन भी ढीठ हैं, स्याने भी - एक चुप सौ सुख. लल्लू को सीख नही दे सकते की बेटा पीठ टटोल और अपनी रीढ ढूँढ, ये प्रेम नही है मेरे लाल - मरने दो साले को!

लल्लू पढा लिखा आदमी है, बहुत चालाक और समझदार भी है, सफल भी - बहुत सफल! नेक भी है, पर यही होता है जब किसी गधा-हम्माल पढाकू के जीवन में जो पहली और एकमात्र लडकी आती है उसी पर लट्टू हो जाने पर. मूरख को लगता है किस्मत खुल गई जी वाह वाह, प्रेम पा गया - इधर समझ में आ रहा है -टाईम पर सही मुर्गा फांस लिया छोकरिया बडी तेज थी, जीनगीभर हलाल करेगी. प्रेम-विवाह - हेप्पीली मेर्रीड एवर आफ्टर!

अँतर्यामिणीं ने लल्लू के लिए मेरे मुखडे पर दुखडा देखा और डायनिका को सपति विदा करने के बाद आगे से ऐसा हृदयविदारक जोडा कभी ना आमंत्रित करने का निर्णय भी लिया. बेचारा लल्लू!

Wednesday, March 09, 2005

अक्षरग्राम अनूगूँजः सातवाँ आयोजन - बचपन के मीत

तब हमारे साथ साथ शहर बडा हो रहा होगा, मगर शहर में हो रहे बदलवों के बारे में बिल्कुल अनभिज्ञ रहे हम! बचपन का जीवन अपने स्कूल और मुहल्ले तक ही सीमित था. मध्यमवर्ग - ये शब्द कई आर्थिक सामाजिक सीमितताओं का प्रतिनिधित्व करता है और उस समय के मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे एक अनोखी समझ से अपने संसाधनो मे से मनोरंजन के साधन खोज लेते थे. खेलों के उपकरण - एक की गेंद दूसरे की बैट और टूटे फ़ाटक के स्टंप बना कर क्रिकेट शुरु! गेंद गुमाने वाले को नई गेंद ला कर देनी होती थी! गुल्ली-डण्डे की गुल्ली पर भी यही नियम लागू था. पतंगबाज़ी, कंचे-गोटिया तो कभी सात फ़र्शी पत्थर जमा कर सितोलिया खेला जाता था! गली के दोस्तों के साथ मित्रता थी पर पक्का मित्र सहपाठी ही था! Akshargram Anugunj

यह मित्र और मैं पहली कक्षा से आठवीं कक्षा तक सहपाठी रहे और पक्के मित्र भी. बचपन के इस मित्र के पिता का तबादला हुआ और ये दूसरे शहर चला गया. पिछली बार दस साल पहले मिले थे - मित्रवत प्रेम बना हुआ था. आज जब पीछे मुड के देखता हूं तो लगता है मित्र से मित्रता थी मगर हमरी मित्रता में वो गहराई नही थी जो मैने कई औरों की मित्रता में देखी है - खासतौर पर जो बचपन के मित्र होते हैं उनकी मित्रता में जो फ़ौलाद होता है - अपने केस मे नादारद रहा. मित्रता चल रही थी क्योंकी कोई परिक्षा की घडी नही आई, अगर आती तो मित्रता निपट जाती. उस के व्यक्तित्व में मेरे लिए मरने मारने पर उतारू हो जाए इतना तसीर नही था - हां मेरे मे था. अब ये किस्मत की बात होती है.

दोनो मित्रों ने साथ बहुत मस्तियां कीं - एक याद आ रही है -

हम तब सातवीं कक्षा में थे, रोज सुबह प्रार्थना होती थी. रामभरोसे हाईस्कूल में आठवीं तक डेस्क-दरी पे बिठाने का रिवाज था. तो प्रर्थना पूरी होते ही पैरों को आराम देने के लिए सब पहलू बदलते. कक्षा में एक सहपाठिनी पहलू घुटनें जरा उपर को कर के बदलती थी - ये रहस्य अपने राम खोज चुके थे - अब उस क्षणमात्र में स्कर्ट उपर होती, सहपाठिनी के लज्जा-वस्त्र के दर्शन हो जाते थे. रहस्य मित्र को बताया गया कुछ ही दिनों में मित्र और मैं प्रार्थना शुरु होने से पहले लज्जावस्त्र का रंग "गेस्स" कर के शर्त लगा चुकते थे. प्रार्थना पूरी होने का बेसब्री से इंतजार होता - बस्स प्रार्थना पूरी होते ही दोनो बडी स्टाईल से मुण्डी घुमाते - किसि को पता ना चले और लज्जावस्त्र के दर्शन पा लेते - सही!!

जो जीतता, यानी जिसका गेस्स किये हुए रंग का ही लज्जावस्त्र उस दिन पहना गया होता वो खिल जाता! दोनो में से जो हारता वो स्कूल खत्म होने पर दूसरे को समोसा खिलाता. अब अगर दोनो ही गलत निकल जाएं तो फ़िर अपने अपने पैसे की खाते. अब दोनो की रफ़ कापी के पीछे रोज पिछले दिनों पहने गए रंगो की लिस्ट होती थी - तो बाकायदा जैसे सटोरिए या लाटरीबाज कल खुलने वाले फ़िगर का कयास पिछले अंक देख कर लगाते हैं सो हम भी कुछ वैसा ही करते - "कल लज्जावस्त्र लाल था उस के एक दिन पहले भी लाल था, आज नहा कर आई है परसों काला था तो आज फ़ूलों वाली सफ़ेद पहनी होगी." और वहीं मित्र लाजिक भिडा रहा है "पिछले तीन गुरुवार से एक ही रंग - भई काला रीपीट होगा"

बडा होने के बाद जब जब प्रोबेबिलिटी, एक्स्ट्रापोलेशन और फ़ोरकास्टिंग विधियों के बारे मे कुछ भी पढा - सातवीं का किस्सा याद आया.

Thursday, March 03, 2005

ब्लागनाद काण्ड और अतुलजी के अनुगूंज प्रस्ताव का अनुमोदन

जन्नतनशीं दादाजी कहते थे - "दुनिया में दो किस्म के लोग होते हैं - रायचंद और करमचंद - करमचंद बनना और करमकचंदो से मित्रता रखना! " दादाजी को निराश करने का कोई मूड नही रहा.

अनूप जी का पीला वासंती चांद पढा था और पंकज जी का आडियो ब्लाग सुना फ़िर 27 जनवरी 2005 को अक्षरग्राम पर एक संभावना तलाशी -

कल्पना कीजिये कि आप जो भी अपने ब्लाग पे पेलते हैं वो आपने एक .mp3 मे भी रेकार्ड किया.
अब ऐसी सभी recorded .mp3 की स्ट्रीमिन्ग ठीक उसी तरह आन-लाईन रेडियो के रूप मे कर दो, जैसे हम नये ताज़े RSS Feed दिखा देते हैं चिट्ठा विश्व के माध्यम से. इस के लिये पहले .MP3s को किसि भी सर्वर पे चढा दो और उसकी लिन्क के साथ कुछ “RSS Feedनुमा” करो, या जो भी बेहतर उपाय हो ऐसा करने का!
Streamer कि लिन्क दे दो, जो रेडिओ जैसा बजेगा आपके प्लेयर पे, सबसे ताज़ा
updated .mp3 सबसे पहले! तो आपका हिन्दी ब्लाग रेडिओ बन गया. Headphones लगाओ और पीला वासन्ती चाँद अनूपजी की आवाज मे सुन लो - आवाज़ का उतार-चढाव भावनाऒ का बेहतर संप्रेशन. अगली .mp3 नरुलाजी की!

फिर सोचा संभव तो होना चाहिए ये करना और उसी दिन के आस-पास ही अतुल भाई ने घोषणा कर दी की हाँ सँभव है!

शुरु से अतुल भाई तकनीकी तौर पर छा गए - मेरी फाईल-नाम की जगह कडी के पते से बजवाने की गुजारिश भी पूरी कर दी ये एक खास टर्निँग पाईंट था, प्लेयर भी शानदार पेल दिया - प्लेयर जान् है पूरे प्रकल्प की - अब प्लेयर ने काफी सीन सँभाल लिया है - जहाँ से जो जी मे आए बजाओ!

अतुल भाई का प्लेयर बन कर तैयार हुआ और जीतू भाई अधीर भए - मुझे आदेश मिला कि पीछे का कोड लिखो - और फटाफट पहला चरण तैयार करो. भई पढूँ तो करूँ मुझे आटोमेटिक मीडिया फीड के बारे मे कुछ ज्यादा नही पता था! बोले नही यार पहले सादा काम करो - पहले प्रकल्प दिखाओ फाईल लोड करने का पेज बनाओ - मैने निवेदन पेला भई पेज बाद में गूगल का 1 जीबी ई-मेल कब काम आयेगा "बडे भाई, ई-मेल मे फाईल मँगवा और आटोमेटिक क्षमल बनवा कर सुनवा दूं ताबडतोड?" जीतू भाई की चेट क्या होती है प्रोजेक्ट मेनेजमेंट होता है खुले दिल से आईडिए इधर-उधर होते हैं. बात तय हुई नाम तय हुआ ब्लागनाद - बकायदा डेड-लाईन तय हुई, मेरे पास एक और प्रोजेक्ट अपना समय ले रहा था और उपर से दफ्तर! जीतू भाई उतरे मैदान में KISS - Keep It Simple Stupid का फंडा-झंडा ले के! बीटा रीलीज देख कर तबियत प्रसन्न है. अनूपजी के अंदाज में कहूँ तो - "आगे भी शुभ होगा!" या अपनी स्टाईल मे- "ये तो बस अंगडाई है - आगे और लडाई है!" :-)

अभी मामले खत्म नही हुए - आपको सुनाने के लिए एक और खुशखबरी तैयार हुई-हुई ही समझो - थोडा इन्तजार!

अतुल भई के आईडिए का मैं अनुमोदन करता हूँ - अनुगूंज को ब्लागनाद पर भी लाया जाए - या ब्लागनाद की तकनीक अनुगूंज जहां भी हो वहां मुहैया हो! - आईडिया मुझे पस‍ंद है पर तय करना मेरा काम नही है! मेरा स्वार्थ तो अनूप जी की आवाज में पीला वासंती चांद सुनना था - अनुग्रहित करो देव!

आपने मुझे इतने प्रेम से पढा और ब्लाग रेडिओ के स्वप्न को साकार कर दिया - आभार!

Sunday, February 27, 2005

टीवी पर साण्ड दिखा!

दिल ढूंढता है फ़िर वही फ़ुर्सत के रात दिन
बैठे रहे तसव्वुर-ए-जानां किए हुए

गालिब के इस शेर के बारे में गुलजार नें सही कहा है, के शब्द तो गालिब के हैं पर भावार्थ हर एक का अपना अपना. खुद गुलजार नें एक गीत तो क्या एक पूरी फ़िल्म, मौसम, का मूड ही जैसे इन दो पंक्तियों के बीच जमा दिया हो! मुझे ये पंक्तियां जीवन पूराण के साण्ड-काण्ड की याद दिलाती हैं.

आज कार में ये गीत दूबारा-तिबारा बजता रहा, शहर का तापमान जरा ठीक हुआ, एक जानी-पहचानी गंध की हवा चली और मुझे अतीत में बहा ले गई.

गर्मियां शुरु होने से कुछ पहले, आम तौर पर फ़रवरी में, एक दिन हवा की तासीर और गंध बदली महसूस होती है. इस गंध से परिचित लोग, उम्र के किसि भी पडाव में समीर-संदेश पढ लेते हैं, और भयभीत हो जाते हैं. ये दिन समय का एक मोड होता था - परिक्षा का मौसम या चालू भाषा में "फ़ाडू-दिन" शुरु हो जाते थे - हम थोडे सहम जाया करते थे. इस दिन के बाद मौसम बदल कर फ़िर चाहे दोबारा ज़रा ठंडा हो ले, अगले २-४ दिन में हर रात अलग-अलग प्रकार के सपने आते हैं - गणित के पर्चा हल ना होवे और फ़ेल होने के डर के मारे थोडी सी मुत्ती निकलने से ले कर स्वप्न-स्लखन तक की पूरी रेंज के सपनें!

वहीं दूसरी ओर , इस फ़रवरी महीने से लगाव पुराना है, अपने शहर में इस महीने का मौसम बडा ही सेक्सी लगता था. ये मौसम पारस्परिक सहमति से शीलग्रहण करने के लिए सबसे उपयुक्त होता है ऐसी मेरी व्यक्तिगत मान्यता है. तो इस महीने में हमारा तन-मन दोनो अपनी-अपनी वजह से तनावग्रस्त रहते थे. दिल घबराहट में समझ नहीं पाता था खून उपर को भेजूं या नीचे! मुट्ठीभर दिल समझदार था पर गुरुत्वाकर्षण बल के आगे झुक जाता.

दफ़्तर माने 'साधो ये मुर्दों का गांव' - दयनीय हैं देसी! ना सोच में तासीर ना तबियत में कोई रंग - काठ के टट्टू हैं इन से नही बता सकते जीवंत यादें उस शहर की जो अभी-अभी मानसपटल पर उभरीं थीं. शहर जो अब इतना बदल गया, किसि और का लगता है. २-३ साल बाद देश अपनी गली में जो ढूंढने जाओ वो तो नही दिखता, पर बदलाव यादों पर भी अतिक्रमण सा करता लगता है. सुना था ई-बे पे सब बिकता है, टाईम-मशीन खरीदने की ट्राई मारी, नही मिली. सच, दिल ढूंढता है फ़िर वही फ़ुर्सत के रात दिन. जबकी उम्र कोई ज्यादा नही हुई हमारी - रीसेन्टली में समय के बदलाव की चाल तेज हो गई है.

एक मित्र अपने शहर हो कर आया, फोन पे बोले यार एक बात कहता हूं - कभी गलती से खुदा से जवानी के दिनों वाली कोई दिख जाए,, ऐसी बद्दुआ मत मांगना, एक मेरेवाली दिख गई थी, जो पतली-पतंग सी बल खाती थी, टायर की दुकान हो गई! इस से तो खयालों मे सही थी.

यादों के सब जुगनू जंगल में रहते हैं
हम यादें जीने के दंगल में रहते हैं.

बीच चौराहे पर बेचारे की यादों का कत्ल हो गया!

ये मित्र, मुझे बहुत प्यारा था, जब हम जवानतर थे, इस इन्सान में चरित्र नामक कोई दुर्गुण नही था. बडा ही सजीव प्राणी था, बहुत ही गर्विला लंपट था. पूरा व्यक्तित्व दो आँखे और एक लिंग तक सीमित था. हमेंशा भरी-पूरी लडकियां पटा लिया करता. बडी मुश्किल से शेर-शायरी सुना-सुनू के एक चतुर्नेत्रा से दोस्ती की - मित्र और हम बाईक पे - (हां वही अंड-संड-प्रचंड वाली बाईक), सामने से वो अपनी काईनेटिक होंडा पर आ रही है, देखते ही दोनो गाडियां सडक किनारे रुकीं. हम २ मिनट बात करके वापस आए और ये बोला "अबे कमाल कर दिया यार .. क्या चीज पटाई है प्यारे चश्मे-बद्दूर!" मजेदार बात कन्या मुस्कुरा रही है. फ़िर बोला - तो कब खेलेगा? अब वो शर्मा कर निकल ली! और मैं सोच रहा था कि ये कन्या एक बुद्धीजीवी किस्म की पढाकू बन्दी होगी! उसके बाद पटाने के तरीके में स्ट्रेटेजिक चेन्ज की जरूरत महसूस होने लगी! फ़िर ये बोला "अबे वो उतनी भी नर्डी नही थी जितनी तू समझा, सही है बे!" - हर एक का अपना फ़ील्ड होता है "कैसे भांपा तूने यार?" - प्रेक्टिस मेक्स मेन पर्फ़ेक्ट. मैं 'स्पेकी' की कल्पनाओं मे खो गया - वो शायद अब २-३ बच्चों की अम्मा बन चुकी हो!

लिखते हुए अंतर्यामिणी से कहा "चश्मेबद्दूर का पता लगवाने का आज भी मन करता है, चाय अच्छी तेज बनाती थी, वैसे चश्में मे क्यूट लगती थी, यार चाय बना दो!" अंतर्यामिणी ने दयाभाव से देखा. किस्सा-ए-फ़ेल्युअरी-ए-इश्क-ए-औना-पौना सुना अंतर्यामिणी की सहानूभूती चाय स्वरूप प्राप्त की जा सकती है पर याद लिमिट में की जाए!

चाय पीते-पीते पता नहीं किस-किस के साथ पी चाय याद आती रहीं - मीठी, कसैली, कडवी. देर रात को चाए पीने का मजा कुछ और होता था - देर रात तक पढते और ब्रेक लेने लिए शहर के बस स्टेण्ड या रेलवे स्टेशन चाय पीने पहुंच जाते वैसे शहर में राजवाडा मतलब डाउन-टाउन में चाय नाश्ते की दुकानें खुली रहतीं. दो-ढई बजे होंगे रात के, एक बार एक चाय की दुकान पर गीत बज रहा था, अपना इस गीत से भी रोमान्टिक लगाव है -

पुकारो, मुझे फ़िर पुकारो
मेरी दिल के आईनें में
ज़ुल्फ़ें आज संवारो

पुकारो, मुझे फ़ुर पुकारो
मेरी ज़ुल्फ़ों के साए में
आज की रात गुज़ारो!

तो चाय-वाले को कहा गया, जब तक हम यहां हैं यही गाना बारबार बजेगा. वैसे ऐसे काम करवाने के लिए दादागिरी की जरूरत नही होती थी - आशिक-टाईप अगर चार यारों के साथ आग्रह कर रहे हैं तो अनुग्रहित करना होता था! अब साथ वाले दोस्त पक गए .. चाय वाले के सामने तो कुछ नही कहा रास्ते में खुन्नस निकाली! उस के बाद कभी ये गाना चित्रहार वगैरह पे भी देख लेते तो मुझे कोसते! जाने कहां गए वो दिन! कल टीवी पर साण्ड दिखा था, अब साण्ड से ईर्ष्या होती है!

Thursday, February 24, 2005

अक्षरग्राम अनूगूँजः छठा आयोजन - मेरा चमत्कारी अनुभव

चमत्कार वो घटना जो अद्भुत रस की उत्पत्ती करे. चमत्कृत व्यक्ति क्षणिक निर्विचार की स्थिती से गुजरता है. अनुभूती विचार पर प्राथमिकता पा लेती है - यह हमारे और पाश्चात्य संस्कृती के मूल फ़र्कों मे से एक है, हम चमत्कृत हो कर खुश हैं वो चमत्कृत कर के. हमने निर्विचार पकडा उन्होंने जुगत. हमने मन के पार जाना चाहा उन्होंने तन-मन लगा कर हमारा धन लूटा. Akshargram Anugunj

फ़िर हम मे से अधिकांश मन के पार जाने लायक तैराक नही थे सो विचारहीनता को निर्विचार की जगह रख अब भाग्यवादिता के सहारे कटने लगी और इसे भक्तिरस का सुन्दर टेग लगा दिया "अजगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काज, कह गए दाज मलूक जी सब के दाता राम". हम लुट कर खुश हो गए! कथा पता नही कितना सच है, हार के फ़्रस्टेशन में आतताई गोरी नें फ़ाईनली गायों को आगे कर हमले किया किए और गो माता के भक्त लडाके तलवार छोड कर सोमनाथ के मंदिर के सामने दंडवत हो लिए - "बचई ल्यो प्रभू बचई ल्यो तिहार भगत जो रहिन हम" मगर जब जरूरत थी तब कोई चमत्कार नही हुआ, कर्म से ही चमत्कार होते हैं. वीर रस भक्ति रस के आगे नतमस्तक हो गया -इस में भयंकर रस का कोई हाथ नही था.. एनी-वेज.. एक्चुली, बात करनी है चमत्कारी अनुभव के बारे में! तो कब चमत्कृत हुए बताना है - ठीक है!

अपने अनुभवों में अनुशासित क्रियाशील 'भक्तों' का जिक्र है- भारत में रह कर ऐसे एक-दो 'चमत्कारी' अनुभव ना हों तो मजा ही क्या? भूत-प्रेत, टोना-टोटका, तंत्र-मंत्र झाड-फ़ूंक बहुत ही विविध है हमारी गुप्त-विद्याओं का बाजार-मेला. विश्वास करने या ना करने का प्रश्न नही है - किस्सागोई का तो बहुत ही सटीक मसाला है, इस हिसाब से रमण भाई ने बहुत सही विषय चुना है!

हमारा किराए से चढा दुमंजिला मकान पारिवारिक आय में अपनी भूमिका निभाता था. उपर वाले हिस्से में एक परिवार आया, फ़िर नीचे वाला हिस्सा खाली हुआ पर १.५ साल तक किराए से नही चढा! पिताजी परेशान हुए, एक भक्त उनके मित्र हुआ करते थे, दोनो कार में साथ मकान के इलाके में कहीं जा रहे थे, हम साथ थे, बातों बातों मे पिताजी ने बताया की अच्छा भला मकान किराए नही चढ रहा. उन्होंने यूं ही मकान देखने की इच्छा जाहिर की. कार मकान के सामने रोकी गई. मकान में घुसते ही देखा उपर वाले किराएदार ने नीचे सुंदर गमले सजा रखे थे. तो उन्होंने एक गमले की तरफ़ इशारा कर के कहा - इसे दूर ले जा कर फ़ोड दें - गमला तोडा तो पाया गया उसमें सिंदूर वगैरह उल्टी सीधी टोना टोटका किस्म की चीजें निकलीं. ४८ घंटे मे ३-४ लोगों ने मकान किराए पर लेने के बाबद संपर्क किया. बाद में उपर वाले किराएदार से जवाब-तलब करने पर वो बोले "हमारी बिटिया जवान है, विवाह लायक है हम नही चाहते थे कि कोई और परिवार निचले हिस्से मे आ कर रहे हमनें मकान का निचला हिस्सा 'बंधवा दिया था'- जमाना खराब है साहब" .. बताईये! तो पिताजी नें उन्हें कहा 'हमने खुलवा लिया है' और ससम्मान सटक लेने को कहा. हम उग्र होना चाहते थे - चुप करा दिए गए, जैसा हमारे यहां होता था, "बडे बात संभाल रहे हैं ना!" खैर ऐसे किस्से आपने भी सुन रखे होंगे - एक और सही - अब ये भक्त अंकलजी से हमारी पटती थी, पूछा ये एक्स-रे विजन कैसे मिलता है गमले के आर-पार देखने वाला? बोले रोज सुबह ३ बजे उठ कर ध्यान करने से!

एक नेत्रहीन भक्त और हैं, ये तो बहुत ही जबरदस्त किस्म की आईटम हैं - इनकी करामातों में मेरे विवाह से पूर्व मेरी होने वाली पत्नी का विवरण बता देना, मुझसे फोन पे बात करते करते मेरे हाथ मेरे सिर पर हाथ रखे होने के बारे में बोल देना. वेतन कब कितना बढेगा बता देना वगैरह है. और भी बातें मेरे बारे मे बता चुके हैं जो देखना है कितनी सही निकलती हैं.

एक बार हम इनके साथ एक परिचित के घर बैठे थे, ये बोले चाय का पानी जितने लोग बैठे हैं उस से ४ कप ज्यादा के लिए रख देना. सो जब तक चाय बनी दरवाजे पे दस्तक हुई और ३ अतिथि अंदर आए, ४था कप ड्राईवर का था. बडी मजेदार बात है, इनके इस तरह के कमाल कर देने के आस-पास वाले लोग इतने आदी दिखे - सहजता से चमत्कारों के मजे लिए जा रहे हैं! ये बताते थे ७ साल की उम्र से साधनारत हैं. बिल्कुल मान सकता हूं.

मजेदार बात है ऐसे व्यक्तित्व वाले लोगों के संपर्क में बिना किसी कोशिश के आया और समय के साथ संपर्क छूट गया. बस ऐसे २-४ मजेदार अनुभव याद रह गए.

Tuesday, February 22, 2005

काले-दीवस की रात...(एक तुकबंदी की ट्राई)

कालीचरण भाई ने पूछा है कि वेलेंटाईन डे के अगले दिन क्या हुआ, पिछले टैट्रम का क्या नतिजा निकला?

काली भाई झेलो उत्तर तुकबंदी जारी है
हाथरसी जैसी, बरसों में, ट्राई मारी है

तो वेलेन्टाईन रात घट गई घटना भारी
वो-वो सडे सुनाए गीत पक गई प्यारी
पक गई प्यारी बोली एक हमारी हो ले?
सुने तुम्हारे गीत अब हमरी सी डी तौलें?

मुर्ग-मखनी तैयार है डिन्नर खाईये
हमे गज़ल सुनना है अब आप जाईये
कह कर चढाई सी डी गज़ल दी बजा
ये प्रेम-गीत बज उठा माहौल में सजा -

पहले तो अपने दिल की रज़ा जान जाईये
फ़िर जो निगाह-ए-यार कहे मान जाईये

पहले मिज़ाज-ए-राहगुज़र जान जाईये
फ़िर जो भी कर्द-ए-राह कहे मान जाईये

इक धूप से जमीं है निगाहों के आस-पास
ये आप हैं तो आप पे कुर्बान जाईये

फ़िर, देररात फ़िल्म टिकट वो दो ले आईं
बोलीं जीवन भर जीयोगे अक्खड की नाईं?
अक्खड की नाईं, स्वामी तुम रहते आए
च्वाईस बुरी रही हमारी - वैसे ही भाए!

फ़िल्म देख लें आज 'काला-दीवस' है
तुमसे सनकी पर कहो किसका बस है!
फ़िल्म देखते-देखते तारीख १५ लग गई
यही है जीवन मित्र, रात गई बात गई!

Monday, February 14, 2005

क्यों आया प्यार का मौसम?

भारी जबरदस्ती है साली - रूमानी हो जावो! अंतर्यामिणी ने एक से ज्यादा बार इंगित किया की सहेलियां अपने अपने मियाँ के साथ इधर-उधर इस-उस रेस्त्राँ जा कर वेलेन्टाईन डे "एन्जाय" करेंगी.. हम भी अड चुके हैं - बोल दिए, सब अगर IE पे सर्फ़िंग करते हैं तो हम जवानी में कभी नेटस्केप पे थे आज फ़ायर-फ़ाक्स पर हैं. सारा हिंदुस्तान गोरा बनने के चक्कर में इन्गलिस इस्पीकीन इस्कूल जा रिया है और हम हरा पत्ता ले के राग हिंदिनी में अलाप रहे हैं, हमारी तो बस्स उलटबन्सी ही बजेगी - भाड मे गया साला वेलेन्टाईन-फ़ेलेन्टाईन! भैंस दी टँग्ग!! हमने अगर वोही किया जो सबने किया तो हम हम कैसे?? हम अपनी वाली चला कर ही रहेंगे. ये अपना अट्टेंशन पाने और अपने आपको non-confirmist, लकीर से हट के अपनी लकीर बनाने का कीडा है जिसका कुलबुलाना हमें हमारे अस्तित्व का अहसास करवाता - ये अपना मूल-स्वाभाव है, ऐसा ही हूं मै - अब कर लो जो करते बने!

हद हो गई यार, हम साल के ३६४ दिन रूमानी रह सकते हैं पर उस एक नही जब हमसे रूमनी होने की अपेक्षा की जावे, अपन ने पत्रिकाओं मे नुस्खे पढ कर और सेट-अप सजा कर मुहब्बत नही की, आए बात समझ मे तो ठीक वर्ना जो होगा देखी जाएगी, आज तो हो लेने दो सब्जी मे नमक तेज - कसम भगत सिंह की खुन्नस में आज मेरे प्यारे म्युज़िक सिस्टम पे भजन, दर्द भरे नगमे "ना किसी की आँख का नूर हूँ" और आएमे डीस्को डांसर जैसे फ़्लाप मिथुनी गीत बजा रहा हूँ!

और आप मे से जो जो किसी भी सामाजिक और भावनात्मक दबाव में रुमानी हुआ है और जबरिया फ़ूल-चाकलेट ले कर घर आया - तुम्हारा मेरा दुआ-सलाम-कलाम सब बंद - ये तुम्हारा व्यक्तिगत मामला नही है बन्धू ये दबाव की राजनीति हम मर्दों का भावनात्मक शोषण है और जेब पर डाका है - यलगार हो, हर-हर महादेव - काली शर्ट-पेन्ट पहन लो, विरोध प्रकट करने को... बजा दो सडे-सडे गाने अपने अपने स्टीरीयो पे और घोषणा कर दो की हमरे रूमानी होने मे अभी १२ घन्टे बाकी है!!

Friday, February 11, 2005

भोंगा पुराण - (तीन)

स्वीट-स्पाट क्या होता है?

स्वीट-स्पाट मतलब मधुर बिंदु, कमरे का वो स्थान होता है जहां पर सीधी और परावर्तित ध्वनियाँ सब से बेहतर सुनाई दें. मधुर संगीत को तमीज़ से सुनने के लिए इतने प्रपंच करने की जरूरत इस लिए पडती है कि हमारे कान पास की ध्वनी को जल्दी और ज्यादा सुनते हैं कोई उपाय नही निकला है कि आप कमरे मे कहीं भी बैठ कर एक से संगीत का आनंद ले सको. तो हमें ध्वनियों की आवाज को और परावर्तन को कमरे के हिसाब से जमाना पडता है - ताकी एक संतुलित माहौल बन सके.

संगीत सुनना और सिनेमा देखना बिल्कुल अलग अलग तरह की जमावट कि मांग करते हैं.
संगीत के लिए चहिए अनुभव गाने-बज़ाने वाल आपके सामने बैठ कर बजा रहे हैं और आप सुन रहे हैं. ध्वनियां साथ-साथ बज रही हैं पर हर एक की अपने आवाज का स्त्रोत अलग है निराला है. भव्य श्रव्य-मंच सज जाए.

सिनेमा के लिए चहिए अनुभव कि आप के आस-पास सब कुछ चल रहा है - वैसे तो सब आपके सामने पर्दे पर ही चल रहा है द्वी-ज्यामितीय पर्दे पर - मगर ध्वनी के माध्यम से त्री-ज्यमितीयता का भास हो- जब दृश्य में जरूरत हो. धमाकेदार आवाजें ऐसी आए की आपको लगे की सच मुच कोई बम या ज्वालामुखी फ़ट गया - चाहे पडोसी बिमार हो पर दिवारें हिल जाएं.

जैसे प्रकाश सीधी रेखा में गमन करता है परन्तु हम अवतल दर्पण की सहायता से उसे एक जगह केन्द्रित कर सकते हैं, स्पीकर्स की जमावट भी ऐसे की जा सकती है की हमें एक स्थान पर सबसे बेहतर आवाज आए. ध्वनी तरंगे हर दिशा मे जाती हैं परन्तु कोन जैसे स्पीकर्स उनको एक दिशा देने का प्रबंध करते हैं - आगे की ओर ही बढाने का - पीछे जाने वाली तरंगे बक्से में ही रह जर गुंजती हैं - आवाज तो अधिक होती है परन्तु आवाज का फ़ैलाव परावर्तित तरंगो द्वारा नही हो पाता - आवाज डब्बे से निकलती प्रतीत होती है - इस लिए एकाधिक स्पीकर्स का प्रयोग कर के हम जमावट बनाते हैं हर स्पीकर का मूह एक स्थान की तरफ़ को कर दिया जाता है. जमाव के कई तरीके हैं - संगीत सुनने के लिए २, २.१, ३, ३.१ स्पीकर्स का प्रयोग करते हैन सिनेमा के लिए ५.१, ६.१, ७.१ का प्रचलन है, रिकर्डिग के डोल्बी मानक बहुत कामयाब हुए हैं. आज-कल सभी इनके बारे मे जानते हैं. हर स्पीकर से निकलने वाली ध्वनियां अलग से स्पीकर तक भेजी और फ़िर बजाई जाती है. ये .१ का मतलब है वो बडा स्पीकर जो बस निचली तरंगे ही सुनाता है, धमाकेदार वाली. ध्वनियों की रिकर्डिग जमावट को ध्यान मे रख कर ही की जाती है ताकी सुनने वाले को दृश्य क हिस्सा ही बन जाने का अनुभव दिया जा सके. डोल्बी के अलावा कई मानक प्रयोग होते हैं - मोनो, स्टीरियो, टीऎचऎक्स - आज बच्चा-बच्चा इन से परिचित है.

एक बात और -

स्पीकर का चुनाव करने का एक महत्वपूर्ण नजरिया है उसकी उपयोगिता और आपका व्यक्तित्व - जी हां, आपके स्पीकर्स आपके व्यक्तित्व और पसंद के हिसाब से चुनें - कैसे?

कोई भी व्यक्ति ऐसा नही है जो या तो बस संगीत ही सुनता होगा या बस सिनेमा ही देखता होगा - सिनेमा भी संगीतमय होती है - खास कर हमारी देसी सिनेमा और हम देसी लोग तो संगीत प्रिय होते हैं.

फ़िर भी एक टेस्ट लो -

आप ज्यादा क्या करते हैं सिनेमा या संगीत?
अगर सिनेमा तो कैसी सिनेमा? शोर-शराबे वाली या संगीतमय!
अगर संगीत तो कैसा? धमाकेदार या शास्त्रिय या वाद्य प्रधान!

मैं वाद्य-प्रधान संगीत सुनता हूं मगर फ़िल्में धूम-धमाके वाली पसंद है अब एक ही सेट पर ये कैसे जमेगा?

मतलब आगे के साईड वाले स्पीकर पे खास जोर रहेगा और फ़िर वूफ़र भी हो दम दार - भले बीच-वाला स्पीकर और पीछे वाले स्पीकर थोडे कमतर हों तो भी मेरा ८०% काम चल गया समझो - तो आपको अपनी जरूरत के हिसाब से तय करना होता है.

अब हमारे एक मित्र जिन्हे डायलाग सुनने में ज्यादा मज़ा आता है साथ ही टीवी अधिक देखते हैं मगर धमकों से सर-दर्द हो जाती है - तो उन्हे एक शानदार बीच वाले स्पीकर की दरकार है भले और उस से मिलते जुलते ही - ज्यादा बडे नही, साईड वाले, छोटा वूफ़र काफ़ी रहेगा. पीछे ज्यादा बडे स्पीकर नही चाहिए.

मान लीजीए किसि भी विभाग में कमी-बेशी बर्दाश्त नही है - हर अनुभव आदर्श चाहिए. ठीक है, अब आप शान-दार स्पीकर्स, महंगे सराउण्ड स्पीकर्स और धमाकेदार वूफ़र से लैस हो गए मगर संगीत सुनते समय कंसर्ट का अनुभव भी चाहिए और सिनेमा के समय पूरा माहैल भी - अब आपको एक खास उपकरण की जरूरत होगी जो आप आपकी हर मुश्किल का हल कर देगा - सही पहचाना बंधुओं - अब आपको एक मल्टी-फ़ारमेट रिसीवर से अपने स्पीकर जोडने होंगे और ये आपको सुनने के लिए आदर्श परिस्थितियां बनाने के काम आएगा.

फ़िर भी आप कभी भी कहीं की ईट कहीं का रोडा भानूमती ने कुनबा जोडा वाला सेट-अप नही बनाएं - ना तो ऐसा सेट-अप दिखने में सुंदर होगा ना ही सुनने मे. सारे स्पीकर्स एक ही आकर के भी लिए जा सकते हैं - देखना ये होता है की आपकी अपनी जरूरत क्या है!

रिसीवर = प्री-एम्प्लीफ़ायर + एम्प्लीफ़ायर.
एम्प्लीफ़ायर = आवाज को बढाने का उपकरण
प्री-एम्प्लीफ़ायर = एकाधिक आवाज से स्त्रोत (टेप, सीडी, विडिओ, रेडिओ) से विद्युत संकेतों को ले कर हर स्पीकर को भेजे जाने वाले संकेत को अलग अलग कर के एम्प्लीफ़ायर को भेजने वला उपकरण.

डाल्बी या टीएचएक्स मानक में रिकर्ड किये गए ध्वनियों को बजाने के लिए स्पीकर की जमावट हमने देखी मगर जब तक अपनी तरफ़ से कुछ कम-ज्यादा खुराफ़त नही की तो मजा कैसा?

जमावट के साथ कमरे के आकर के हिसाब से, अपनी पसंद के संगीत और स्पीकर्स के हिसाब से खुराफ़ात कैसे करेंगे ये देखेंगे आगे! ये तो बस शुरुआत है.

Tuesday, February 08, 2005

भोंगा पुराण - (दो)

देखें विचित्र भोंगे और जानें स्पीकर्स की पक्की परख और परीक्षण कैसे करें?
(खास स्पीकर स्टेंड)

भोंगा पुराण के पहले भाग मे स्पीकर्स के खास खास प्रकारों का तुरत-फ़ुरत जायजा लिया हमनें.

ऐसा क्यों होता है की एक से ही दिखने वाले कुछ स्पीकर महंगे होते हैं, कुछ सस्ते. कभी कभी सस्ते स्पीकर्स की आवाज ज्यादा अच्छी लगती है महंगे स्पीकर्स से. जो दुकान में अच्छा सुनाई दे रहा था घर पर वैसा अच्छा सुनाई नही दिया - क्यों?

स्पीकर्स का बाज़ार बहुत गोरखधंधा है, सही, मगर उपभोक्ता भी कुछ बातें नजर अंदाज कर जाते हैं -

पुनर्निमित ध्वनियों की गुणवत्ता सबसे अधिक स्पीकर पर ही निर्भर करती है पर आपको स्पीकर्स से दोस्ती करनी होगी - उनके बारे मे राय बनाने से पहले उनको सुनने का उत्तम माहौल तैयार करना होगा - वो घर पर करने का काम है - उसके बारे मे इत्मिनान से बात करते हैं पहले एक तकनीकी पक्ष -

संगीत बजाना एक लम्बी कडी का काम है, रिकॊर्डिंग बहुत स्पष्ट हो, कापी किया हुआ या कम गुणवत्ता का या बहुत ही पुराना लाईव रिकॊर्ड किया संगीत वो मजा नही दे सकता , प्लेयर अच्छा हो, वायर्स मे कोई टूट-फ़ूट ना हो और स्पीकर को चलाने वाल उपकरण स्पीकर के मानकों के हिसाब का हो - खुले बाज़ार से कसवाए उपकरणों जिनके तकनीकी ब्योरे ना मिले, से बचना चाहिए - क्योंकी अलग-अलग उपकरणो मे ताल-मेल बिठाना पडता है और इस के लिए हर उपकरण के बारे में ये पता हो की वो किस प्रकार के दूसरे उपकरण के साथ बेहतर चलेगा. अगर इस सब से बचना हो तो अपने कानों को अच्छा लगने वाले डिब्बा-बंद सिस्टम जिसमें प्लेयर, एम्प्लिफ़ायर या रेसीवर और स्पीकर सब साथ आते हैं ही ले लेना चाहिए. उनकी परख पर आगे जानेंगे.

(डायनामिक-स्टेटिक हाईब्रिड)

अब अगली बात, डब्बे जैसे बजने वाले, उन्ची आवाज मे भर्राने वाले, कम आवाज मे संगीत की पूरी रेंज का मजा ना दे पाने वाले स्पीकर्स को सिरे से खारिज कर दो. इसके लिए अपने मन पसंद संगीत को किसी बेहतर से बेहतर माल बेचने वाली दुकान पर बेहतर टेस्ट-सेट अप में एकाधिक बार एकाधिक सिस्टम पे सुनो और उसके गुणों को समझो.

स्पीकर वो जो सुनाई ना दे - हां सही पढा आपने, स्पीकर वो जो (खुद) सुनाई ना दे - वो बस सुनाए! उसका काम संगीत को ज्यों का त्त्यों रखना है, अपने आप का कोई गुण प्रदर्शित करना नही है. आवाज ऐसे आए जैसे किसि पारदर्शी माध्यम से हो कर सीधे अपने मूल से आ रही है, रिकार्ड हुई पर गाने वाला या बजाने वाला यहीं है इतना सच्चा आभास हो सके.

अक्सर संगीत में हमें निचली आवृत्ती की आवाजें अच्छी लगती हैं मगर अधिकतर आवाजें मध्यम आवृत्ती की होती हैं और कुछ घंटी नुमा आवाजें उच्च आवृत्ती की होती हैं , इनका संतुलन हो और अपको इनको प्लेयर पर संतुलित करने की जरूरत ना पडे! कम आवाज में पूर्णता रहे और आवाज बढाने पर कर्कश ना हो - आवाज मे खालीपन ना हो और नकली भारीपन ना हो. अब एक आदर्श स्पीकर - वो माहौल को आवाज़ से एक सा लबालब भर दे - बिना कानों पर शोर-शराबे का बोझ डाले - ऐसा ना लगे कि इस या उस कोने से आवाजें आ रही हैं और हम सुन रहे हैं - छोटे स्पीकर्स में ये गुण नही हो सकता इस लिए आज कल छोटे स्पीकर्स का एक पूरा समुच्चय कमरे मे आव्यूह जैसा लगा दिया जाता है - जिसका कुल जमा काम कमरे को सीधी और परावर्तित ध्वनी से भर देना होता है मगर आकार छोटा होने से आप मध्यम आवृत्ती की ध्वनियों के साथ अगर काफ़ी नही तो कुछ हद तक ही सही, नाइंसाफ़ी कर ही दोगे - एक बात - संगीत सुनने का मजा परावर्तित ध्वनियाँ बढाती हैं - इसलिए, महौल बस संगीत ही सुनने के लिए, आदर्श तरीके से बनाने के लिए दो स्पीकर्स का कैसा जुगाड जमाते हैं वो आगे जानेंगे.

अगर रिकार्डिंग अच्छी है तो उसकी एक खासियत को हमरी जमावट ने खास जाहिर करना चाहिए - वो है हर वाद्य का दूरसे वाद्य से हर गायक की दूसरे गायक से पारस्परिक त्री-ज्यामितीय (थ्री डायमेंशनल) और ध्वनीय आपेक्षिकता (म्युज़िकल रिलेटिविटी) आपको माहैल में महसूस हो. कौन आगे बैठ कर बजा रहा है और कौन पीछे है, किसकी आवाज कब ज्यादा और कब कम ज़ाहिर की जा रही है -एक दम सटीक श्रव्य अनुभूती हो!

कुछ मुद्दे की बातें - आप एक ही स्पीकर के सेट पे संगीत और फ़िल्मों का या होम थिएटर का अनुभव अगर लेना चाहते हैं और वो भी बिल्कुल ही आदर्श तरीके से - मतलब की जब संगीत सुनें तो कंसर्ट हाल का अनुभव हो और जब फ़िल्म देखें तो सिनेमा हाल का - सोचिए क्या हम बस का काम ट्रक से लेते हैं या ट्रक का बस से? जहां जिस किस्म का परिवहन चाहिए -वाहन मे परिवर्तन होता ही है. ध्वनी के साथ भी यही सत्य है - फ़िर भी एक संतुलित सिस्टम कैसे बना सकते हैं ये देखेंगे आगे.
(प्लेनर-डायनामिक हाईब्रिड)

Saturday, February 05, 2005

इक बंगला बने न्यारा ...

मेरी बस एक रात के रतजगे का नतीजा है हिंदिनी का श्री गणेश!

आजकल आपके ब्लाग के प्रबंधन के कई साफ़्टवेयर उपलब्ध हैं. आपकी साईट हिंदी मे होगी, आपको बिल्कुल ज्यादा मगजमारी करने कि जरूरत नही है - दोस्तों पे भरोसा करो और वर्डप्रेस को चुनो! ये मुफ़्त का हीरा है - जिसको चमकाने वाले लोग आपके अपने हैं. और ये दुनिया के किसि भी ब्लागिंग साफ़्टवेयर से टक्कर ले सकता है! आप ब्लागर बंधुओं जैसी सहायता नही पा सकते - ये मेरे अनुभव के आधार पर बता रहा हूं. क्यों की हमारे लोग सारी दुनिया मे रहते हैं और संपर्क मे होते ही हैं सो रात के २ बजे भी कोई दिक्कत नही होगी. एक और फ़ायदा कि आप चाहें तो अपना या सामूहिक ब्लाग या लेखन प्रबंध कर सकते हैं.

सबसे पहले अपनी खुद की साईट खडी करने का फ़ायदा क्या है जब की ब्लाग-स्पाट मुफ़्त की जगह और टूल देता है!

फ़ायदा है -
१. आपके एक स्थाई और गंभीर ब्लागचिए होने का पहला सबूत आपका डामेन होता है. एक कडी जो आपके ब्लाग से ही जुडी हो बस.
२. आपका अपने ब्लाग कि सज्जा पर पूरा नियंत्रण और आप के पास ब्लाग से संबंधित ई-मेल आईडी.
३. आपके फोटो, ब्लाग, अन्य फ़ाईलें रखने का आपका अधिकार क्षेत्र.
४. ब्लाग तो क्या आप अपने व्यवसाय की जालस्थली, मित्रों के ब्लाग, और कई दूसरी जरूरतों के लिए इस स्थान का प्रयोग कर सकते हो.
५. मनचाही एप्लिकेशन्स और टूल्स का प्रयोग कर सकते हो.
६. तर्क संगत वर्गीकरण पोस्ट्स का!

सबसे पहले एक साईट का नाम रजिस्टर करवाया.
फ़िर साईट को किस कंपनी के सर्वर पे रखना है वो तय किया.

अपनी साईट का नाम सोचिए और नाम को रेजिस्टर करवा लीजिए.
फ़िर साईट का डाटा कहां रखा जाएगा वो तय कर लीजीए.

जब भी ये काम करना हो, अक्षरग्राम पर एक पोस्ट कर दीजिए, एकाधिक लोगों का जवाब आने दीजीए और अपनी गूगालबाज़ी चालू रखिए, आप कोई भी ऐसा काम नही कर रहे जिस पर किसि और ने अपना हाथ ना आजमाया हो, आपको तत्काल सही भाव वाली साईटों की जानकारी मिल जाएगी. फ़िर इसी बहाने इन कंपनियों के रीव्यु इत्यादी भी मिल जाते हैं.

आपको दोनों कंपनियों की साईट पे कुछ फ़ार्म भरने होते हैं फ़िर वो आपको बता देतें हैं कि आपका काम करने मे उनको कितनी देर लगेगी. वैसे ये दनादन मेलें भेज देते हैं ४-५ मेल - जिसमे सारी जानकारी होती है. आसान है.

जब ये दोनो काम हो जाए तो अब आपको ये जमाना है कि जब कोई आपकी साईट क पता डाले अपने ब्राउजर पर तो वो आपके होस्ट तक पहुचे. ये करना बहुत आसान होता है.
जब आप नाम रजिस्टर करवाते हो तो वो कंपनी एक पेज दिखाने लगती है - "शीघ्र आ रही है ... आपकीसाईटकानाम.आपकीसाईटकाप्रकार" आपकी साईट होस्ट करने वाली कंपनी आपको दो पते देती है जो नेमस्पेस कहलाते हैं .. आपको ये पते अपने रेजिस्टर करने वाली साईट पे लाग ईन कर के डाल देने होते हैं. बस! कोई दिक्कत आए तो अक्षरग्राम है या आप कंपनी से संपर्क कर सकते हो.

मैने २-३ लाईनों की ई-मेल की जीतू भाई को, कि अगली स्टेप क्या होगी - और जवाब मिल गए!

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u do not need to do anything, except run such script. they would do
everything for you. Raman Kaul has more information about these
fantastico script.

चूंकी हम वर्डप्रेस का प्रयोग करेंगे सो मैने पहले ही php/mysql होस्ट करने वाले कंपनी चुनी. कंपनी वालों के पास ८० से अधिक साफ़्टवेयर और उनको लगाने कि १-२ बटन दबाउ स्क्रिप्ट भी थी ना हो तो आप उस को इन्टर्नेट से ले सकते हो. मैनें ये स्क्रिप्त सूची मे देखी और लो जी वर्ड्प्रेस इन्स्टाल हो गया. १ पेज का फ़ार्म भरा कि जी हमरा नाम ये और साईट का नाम ये दिखा दो ,आप अपने आभी के ब्लाग का डाटा भी नए ब्लाग पे ला सकते हो. लो जी बन गया नया घर.

अब बात आई हिंदीकरण की, अक्षरग्राम पे जितू भाई बता रहे हैं वर्ड प्रेस १.५ की मदद और हमारी स्क्रिप्ट ने लगाया था १.२ - पल्ले नही पडा क्या हो रहा है - फ़ाईलें किधर हैं? फ़िर पंकज जी को फ़ोन घुमाया, मुझे बात साफ़ हुई, जितू भाई से संपर्क किया और हम १.२ को १.५ बनाने और हिंदीकरण मे जुटे. आपको तो और भी आसानी होगी. रमन जी ने ताजे १.५ का हिंदीकरण कर दिया है. आपका काम तो अब बिल्कुल सीधे-सीधे हो जाएगा.

मेरी बस एक सलाह है, जब भी आपका ब्लाग या साईट शुरु करने का मन हो किसि भी जरूरत के लिए, आप साथियों से मदद लेने मे हिचकिचाओ मत.

यहां पर सब प्रोफ़ेशनल खब्ती हैं - हर एक की अलग गुणवत्ता है, रमणजी और पंकज जी आलराउन्डर हैं.

जितू पेलवान, रीमोट डेवलपमेंट के उस्ताद, याहू मेसेन्जर से सब हेण्डिल करते हैं, माने हुए ओपनर हैं. गुस्सा आ जाए तो सेंचुरी मार कर ही दम लेते हैं और नए खिलाडी पे लोड नही आने देते, मेरी नैया इन्होने ही पार करवाई - उस पर तो एक अलग पोस्ट बनती है, मूड बना कर लिखुंगा - अदा भी निलारी है, पेटर्न कुछ यूं है - "यार तुमने ऐसा क्यो किया"... "चलो कोई नी" ... "गूड".. "फ़िर....ये क्यो किया"... "चल कोई नी"... "गूड" .. हा हा और एक बार तो खुद ने फ़ाईलें भलती जगह डलवा दी और हम दोनो कि हंस हंस के हालत खराब, काम अनुशासित तरीके से पक्का करते हैं. सच एक बहुत मजेदार पोस्ट बनेगी उस रात वाल पूरे वाकये पर. बहुत मददगार; मजेदार शख्सियत है इनकी! हां भाव पहले तय कर लेना बडे भाई की मदद लेने से - मजाक मे बोले अब १०० डालर भेजो फ़ीस के. हा हा हा. सच मदद और राय तो २०० डालर वाली थी इनकी. और हंसा हंसा के खून इतना बढा दिया कि अगले दिन रक्त दान का मूड बना रहा.

अतुल जी के बाउन्सर फ़्लेश प्लेयर को तो आप देख ही चुके हो. हाँ, दुर्लभ दर्शन देव बाबू का चिट्ठा-विश्व देख कर दिल खुश हो जाता है, जावा के धनी लगते हैं.

बस ये सपना है कि हिंदी के कुकुरमुते तो क्या पीपल और बरगद जैसी साईट्स बनें टूल्स बनें - बिल्कुल भी असंभव नही है.

Saturday, January 29, 2005

भोंगा पुराण - (एक)

स्पीकर्स को हिन्दी मे क्या बोलते हैं पता नही पर एक खास किस्म के लम्बे स्पीकर को हमारे गांव मे भोंगा बोला जाता है - खोपडी मे किसि और शब्द कि आम अनुपलब्धि होने से भोंगा से ही फ़िलहाल काम चलते हैं.

भोंगा या स्पीकर बडे काम की चीज है - ध्वनी उत्पन्न करने का वैद्युत उपकरण, अमेरिका मे बसे अधिकतर देसी अपने संगीतप्रेम का सबूत महंगे भोंगे खरीद कर देते हैं. गाने या बजाने का शौक एच १ धारी में कम ही पाया जाता है सो अपने उम्दा श्रोता होने कि छटपटाहट मे आम तौर पर देसी बोस कंपनी के स्पीकर्स पर वारी-बलिहारी होते देखे जाते है. उनकी टांग खिचाई ईत्मिनान से बाद मे कभी.

आम देसी जो दुनिया मे कहीं भी रहता हो उसके लिए भोंगा बस एक तरह का होता है - अलग अलग आकार का मगर एक तरह का.

आप किसि देसि से पूछो भोंगे कितने प्रकार के - बोलेगा वूफ़र, होर्न, ट्वीटर और मिड-रेंज. देसी का दोष नही है. डायनामिक स्पीकर ८०%-९०% मारकेट पे और हिन्दुस्तान की १००% मारकेट पे राज करते हैं!

डायनामिक स्पीकर्स मे आगे होता है एक कोन और पीछे होता है एक बडा चुम्बक, और एक क्वाईल. सुधी-जिज्ञासुओं को उनकी कार्य-प्रणाली पता ही है.

दो और जबर्दस्त किस्में हैं स्पीकर्स की - इलेक्ट्रोस्टेटिक स्पीकर्स और प्लेनर स्पीकर्स. इन मे भोंगा या शंकु नही होता! मगर इनमे ध्वनी आगे और पीछे दोनो तरफ़ से एक सी निकलती है! हां जनाब यह तो बस एक खासियत है. भाग दो में और लिखुन्गा उन पर!

इलेक्ट्रोस्टेटिक स्पीकर्स - एक महीन पर्दा जो आगे-पीछे हिल कर ध्वनी उत्पन्न करता है. ये पर्दा चुम्बकीय पदार्थ का बना होता है जो अपने ही आकार के विद्युतीय क्षेत्र में रखा जाता है. यह विद्युत क्षेत्र दो "स्टेटर्स" को इस झिल्ली जैसे महीन पर्दे के आगे और पीछे रख कर बनाया जाता है. पर्दा स्टेटर्स से समान दूरी पर बीच मे रखा जाता है. स्टेटर्स को बिजली के तारों से जोड कर बिजली प्रवाहित की जाती है.

स्पीकर को चलाने के लिए पर्दे पर इलेक्ट्रान का घना जमाव पावर सप्लाई का प्रयोग कर के किया जाता है. ध्वनि संकेत दोनो स्टेटर्स को भेजे जाते हैं, मगर एक खास तरीका होता है - दोनो स्टटर्स मे संकेत एक सा मगर १८० अंश पर उल्टा प्रवाहित किया जाता है. अतः जब एक स्टेटर मे संकेत क वोल्ट बढता है दूसरे मे घटता है तो बीच के पर्दे पर दोनो तरफ़ स्टेटर के चर्ज से उल्टे चार्ज जमा होते हैं इसका कुल जमा असर ये होता है की पर्दा एक साथ खीन्चा-धकेला जाता है. जब प्रवाह उलट होता है तो खीन्चाव का बल भी उलट दिशा मे जाता है. पर्दा हल्का और महीन होता है अतः उस्के हिलने से पास की हवा भी हिलती है और ध्वनी पैदा होती है.

प्लेनर स्पीकर - (स्वामी के चेहरे पर मुस्कान, आई लव यू जी, जिक्र उस परिवश का .., हाए ज़ालिम, आए हो मेरी जिंदगी मे तुम बहार बन के, वगैरह)

प्लनेर स्पीकर दिखने मे तो तकरीबन इलेक्ट्रोस्टटिक स्पीकर जैसे होते हैं मगर वो डायनामिक तरीके से काम नही करते अतः इनको अलग से बिजली दिये जाने की जरूरत नही होती. प्लेनर-चुम्बकीय मे विद्युत प्रवाह को धातु की रिबिन मे प्रवाहित करते है, इस रिबन के चारो और ताकतवर चुम्बक होते हैं - तो जमावट इलेक्ट्रोस्टेटिक स्पीकर से जरा उलट सी है. रिबन मे जब करंट प्रवाहित होता है तो आगे पीछे के चुम्बक उसे खीन्चते-धकेलते है क्योंकी दोनो तरफ़ अलग अलग चार्ज जमा हो जाता है रिबन पर. इस के कुल-जमा प्रभाव से ध्वनि उत्पन्न हो जाती है.

एक पांच फ़ुटिए की तस्वीर पेश है -

प्लेनर-मेग्नेटिक ड्राईवर मे कई फ़िट लम्बी रिबन लगाई जाती है और उच्च व मध्यम-रेंज की फ़्रीक्वेंसी को एक दम सही उत्पन्न करते हैं - जितनी कम फ़्रीक्वेन्सी की ध्वनी उत्पन्न करना होगी उतना ही रिबन का लम्बा रखना ज्यादा जरूरी होगा जिससे स्पीकर का आकार बडा रखना जरूरी होगा - इस लिए इन का वूफ़र जैसे प्रयोग के लिए उत्पन्न की गई फ़्रीक्वेन्सी के लिए कम प्रयोग होता है - शौकीनों के दूसरे कारगार उपाय होते हैं उनके बारे मे कभी जरूर लिखुंगा.

तो इतने बडे स्पीकर्स क्यों बनाए जाते है? क्या खास है इनके बारे मे और जो एक बार इनको सुन ले वो कभी कुछ और पसंद नही करता? कोई तो बात है! ढेर सारा पैसा और प्यार उंडेला जाता है इन पर, खास सेट अप मे सुना जाता है - क्यों?? अभी अगले अंक मे इन स्पीकर्स के बारे मे क्या-क्या लिखुंगा सोचा नही है - मगर भाग दो आयेगा जल्दी ही.

Monday, January 24, 2005

एक झकास हास्य प्रस्तुति

पाश्चत्य विश्व में भारतीय व्यावसायिक और तकनीकी क्षेत्रों मे मनोरंजन और माध्यम से अधिक सफ़ल रहे हैं. अनिवासी भारतीयों से दूसरी या तीसरी पीढी के निवासी मुख्यधारा में आसानी से उपस्थिती दर्ज करवा पाए हैं और अब पहले से ज्यादा आम स्विकृति भी पा रहे है. रसेल एक ऐसे ही भारतीय मूल के कलाकार हैं जो अपनी पृष्ठभूमी और शैली से हास्य उपजाने मे सफ़ल रहे हैं ...
४५ मिनिट का मसाला

Sunday, January 23, 2005

बरगद का बोंसाई

एक कार्पोरेट उठा पटक का आंखो देखा हाल!

तो कार्पोरेट कडियाँ जमी थीं सालों के साथी अपने अपने स्थानों पर ठस के अडे थे, अपने व्यावसायिक ज्ञान, मनोभाव समझने की योग्यता और बहुमुखी गुणों के दम पर पाये हैं पद, उम्र के तीसरे पडाव में महंगी कारें, ऊंची तनख्वाहें, भत्ते, कार्पोरेट कार्ड, जिंदगियों के रुख बदल देने के अधिकार, क्या नही है इनके पास. एक के नीचे एक उलट वट-वृक्ष सी फ़ैली सत्ता, सत्ता के नक्शे पर उन्चे विराजमान ये, क्या कोई हिला सकता है इनकी गहरी जडें? नही! असंभव - अच्यूत हैं ये, बरगद जैसे अपनी मिट्टी में जमे हैं!

मगर कैसे हुई सनसनी, झनझनी और झुरझुरी एक के बाद एक ... जो तोडा ना जा सके, काटा ना जा, सके, हटाया ना जा सके उसको कैसे निपटाया जाता है एक केस-स्टडी प्रस्तुत है गुरु, अपन ने अपनी लाईफ़ में ऐसा अर्थपूर्ण शीर्षक नही लिखा- बरगद का बोंसाई!

बोन्साई (bonsai)- बडे-बडे वृक्षों को बौना कर के छोटे-छोटे गमलों मे उगा देने की जापानी कला!

शुरु हुए विभागीय फ़ेर-बदल, सूचना-तकनीक और क्रियाशील दल , दोनो के विभगाध्यक्षों की अदला-बदली और एक जबरदस्त पुनर्संरंचरण का प्ररंभ. कथित कारण - दोनो विभागाध्यक्ष अपने नए विभागों को नए दृष्टिकोण देंगे और पूर्वानुभव के आधार पर दूसरे विभाग के साथ बेहतर सामंजस्य बिठाएंगे, मगर इन सब का बाप जो सबसे ऊपर बैठा है उसके गणित वही जाने!

सो सूचना-तकनीक विभाग के पास एक नया विभागाधक्ष जिसने जीवन मे एक प्रोग्राम तक नही लिखा, इसका नाम काईंयाँ है, वो आते से ही करता है एक नई नियुक्ती - लाता है एक पुराना साथी, सूचना-तकनीक कि समझ, आया है जहां से पका है प्रबंधन कम और राजनीति के गुणों में अधिक. आसानी के लिए इसका नई नियुक्ति क नाम कलाकार रख देते हैं

खेल शुरु,
कलाकार ने आते ही माहौल सूंघा, तीन चार गुट हैं हर गुट की नेता एक आई टी मेनेजर, उन के पास अपने कर्मठ गार्ड-डोग कुत्तों का समूह, मगर इन मेनेजर्स में से एक के पास खास दल-बल, वफ़ादार टीम लीडर्स, प्रोग्रामर्स और कई नए मेमने नई टेक्नोलोजी के खेतों मे खेलते - काम की दादागिरि और खुशहाल! बस इस खास मेनेजर का बनाया जाना है बोन्सई - ये पुराने विभागाध्यक्ष की खास है, बुढा रही है मगर है विशेषज्ञ और इस के पद पर है कईयों कि निगाह! चलिए इस मेनेजर को बरगद बोलते है.

कलाकार की कुछ खास-खास चालें -

१. बरगद के नीचे वाले टीम-लीडर्स से अकेले मे संपर्क पता लगाना कि उनमे सबसे सशक्त कौन, उनको अधिकार और नए प्रोजेक्ट के ऐसे तकनीक के नए काम देना जिसका मेनेजर को ज्यादा ज्ञान नही. हां इसको आम भाषा में काम खींचना कहते हैं, उनको अब बरगद को नए कामों कि ज्यादा रिपोर्ट करने कि जरूरत नही - नए कामों का जिम्मा खुद लेना.

२. बरगद की एक शाखा - एक पूरा विभाग पुनर्संरंचण के नाम पर दूसरी मेनेजर को देना. दूसरे विभागों में फ़ेरबदल, बरगद से प्रतिस्पर्धा करने वाली इस दूसरी मेनेजर से हाथ मिला कर उसके एक वफ़ादार को तरक्की दे कर अब उसके नीचे बरगद की दूसरी शाखा डाल दी गई और दो उप विभागों को मिला दिया गया.

३. बरगद को पुरानी तकनीक के एक नए बहुत बडे काम मे उलझाए रखना और तारीफ़ किए जाना. बरगद को अधिक बोनस और पुरुस्कार.

४. तीन-चार फ़ेर बदल और - नए काम शुरु करना, उनमे से एक को छोड कर बाकी में तरक्की दिखाना.

५. इस नए काम के लिए बरगद कि सहायता की आवश्यकता होगी बता कर बरगद के स्तर पर एक नई नियुक्ति और. बरगद को खास सलाहकार का नया प्रमोशन दे कर बस सिर्फ़ उसकी महत्वपूर्ण राय दिये जाने क जिम्मा! बाकी बरगद की टीम अब इस नई नियुक्ति को रिपोर्ट करेगी. नई नियुक्ति की सहायता प्रतिस्पर्धी मेनेजर करेगी और फ़िर उसके नीचे ही नई नियुक्ति काम करेगी. यह सब बरगद की देख रेख मे होगा.

और यूं बरगद का बोन्साई बन गया! इस काम मे कलाकार को तकरीबन १.५ साल लगे! अगर कंपनी का आकार बढ रहा हो तो पुराने बरगदों का बोंसाई बना दिया जाता है और नए जंगल उगा दिए जाते हैं फ़िर अगला दौर होता है, वनों की बेरोकटोक कटाई का, आउट सोर्सिंग का या कुछ और घातक जिस पर पुराने बरगदों का बस ना रहे. शुरुवात की जाती है ऊपरी फ़ेरबदल से जिसमें कमाते हैं सभी और बली चढते हैं मेमने. खेल की रफ़्तार होती है तेज़.

प्रबंधन के घाघों कि शातिर चालें, कर्पोरेट सेंधमारी के गुर; जो किसि भी किताब मे लिखे नही जाते किसी व्यावसायिक पाठ्यक्रम में पढाए नही जाते शायद सिर्फ़ कर के दिखाए जाते हैं, कई काण्ड देखे मगर इस वाले कि अदा भा गई, बहुत खूब! बरगद का दो दशक का करियर २ साल में पलट गया, इस से पहले ३ एक-आध दशक वाले तो सिरे से निपटा दिए गए - अपनी आंखों के सामने!

बेचारे निचले स्तर वाले, यहां पर अस्तित्व की रक्षा की जाती है अपने सींग तेज़ लम्बे और नुकीले रख कर, नए गुर याद हों और खुर मज़बूत -जमे रहना, भागना निकलना, हरियाली तलाश लेना और जुगाली पचा लेना. कब क्या कैसे क्यों! आम अमरीकी अपने जीवन मे २-३ करियर बदल लेता है, नौकरियों कि तो गिनती ही क्या!

Friday, January 21, 2005

कतरन और खुरचन का छायावाद

यहां पर छायावाद शब्द के घुसाये जाने की कोई जरूरत नही थी परन्तु ऐसे शीर्षक लिखने से जनता में एक कौतुहल जाग सकता है और वो मुझे साहित्यिक अभिरुचियों वाला समझने की क्षणिक मगर अच्छी भूल भी कर सकते हैं.

छायावाद के बारे मे अगर पूछा जाये तो मैं महादेवी वर्मा का जिक्र कर के छूट सकता हूं, मगर उदाहरण मत पूछियो - उस पे गूगल नही मारी.

"छायावाद" इस शब्द का अर्थ नही पता, बचपन मे हमारे घर आने वाली पत्रिकाओं में घिसियारे अपने सत्य-घिसियारे होने के सबूत देने के लिए शीर्षक मे इस शब्द का प्रयोग खुल कर करते थे - कमीने साले, बहुत खुन्नस आती थी ऐसी हरकतों पे. इस का छायावाद, उस का छायावाद - अबे क्या? सीधे फ़ूट ना जो कहना है!!

बचपन कि खुन्नस निकाल रहा हूं, वैसे मैने अपने गाढे पसीने की कमाई कभी देवनागरी मे छपे कचरे पर व्यर्थ नही की सो हमें "वर्ना-कूलर" वाली गाली से ना नवाजा जाए - हमरा कूलत्व बहुत मेहनत से कमाया गया है.

खुरचन - बचपन की बात पे क्या दिन याद आ रहे हैं, अ-साहित्यिक जनता गुलशन नन्दा के उपन्यास पढती थी, और जेम्स हेडली चेइज़ कि सनन सनसनी भी. चन्दामामा और अमर चित्र कथा से ज्यादा हमें ईन्द्र-जाल के फ़ेन्टम और मेन्ड्रेक प्यारे थे. हम हिन्दी वाली लाते कानवेन्टी पडोसी अन्ग्रेज़ी वाली फ़िर अदला-बदली होती वो दोनो मजे ले के पढता और हम अन्ग्रेज़ी वाली कामिक्स पढ लेने का ढोन्ग कर के अपनी इज्जत बचाते. धर्मयुग कितने प्यार से निपट गई पता भी नही चला कब निपटी - ज्ञानीजन प्रकाश डालें!

बाद मे पता लगा की लाईब्रेरी नुक्कड कि वो किराए से किताब देने वाली गुमटी नही होती - बाकायदा सीमेंट-कंकरीट की ईमारत होती है. राम-भरोसे हाईस्कूल मे लाईब्रेरी नामक कोई खोली नही थी.

आजकल का पता नही छायावाद जिन्दा है कि मर गया कोई ज्ञानी जानता हो तो टिप्पणीं मे पंडिताई निचोड दे.

दिमाग मे कच्चे, अधपके, अधूरे विचार मुरझाते रहते हैं, पल्ले नही पडते किन शब्दों मे लिखो - आलसी जनता ने मेहनत से बचने के लिए छायावाद गढा होगा, मेरा मतलब महादेवीजी के अलावा, अपन चेम्पियन लोगों से नही अडते, जब पढते नही तो अडेंगे कैसे!

सो बडे लोगों का भला हो आज हम भी छायावाद के मूड मे हैं, तो बतायेंगे नही कि किस बारे मे लिख रहे हैं मगर लिखेंगे. छायावाद लिखना पढे जाने के आत्म-विश्वास का सबूत है - बडे लोग ही ऐसी रिस्क लेते थे, अचानक कुछ अनबूझ सा पेल दो फ़िर देखे जनता पागल बन रही है. हमको भी अपनी औकात परखनी है, हम भी छायावाद लिखूंगा - अब धुन लो सिर और कौतुहल के मारे अगला पेरा पढो!

कतरन - ये मेरी लेखन शैली पर टी वी का प्रभाव है एक ही साथ अलग अलग डब्बों मे बिल्कुल असंबंधित चीज़ें लिख दो और दनादन एक के बाद एक दिखाओ, बीच-बीच मे जो बात थोडी देर पहले बोली जा चुकी है वो दोहराओ, तिहराओ, ये खबरों का छायावाद अपकी सुविधा के लिए है ताकी आपको चेनल ना बदलना पडे, मतलब किसि और के ब्लाग पे जाने का अनुभव इधर ही, भाड मे गई आर एस एस फ़ीड - मैं हूं ना! आगे बढें?

यार तू केना क्या चा रियाए?

कुछ नही! मगर छायावाद इसी को कहते हैं कि कहो मत मगर सुनने वाले को वो सुन लेने का अनुभव हो जो नही कहा- ये २ दिन के कब्ज के बाद जोर दे कर निकाली गई हवा का गंध है - जो नही किया वो भी हो गया जैसा लगे. ३-४ दिन से अपनी लेखनी को भी कब्ज भया है, और ऐसी परिस्थिती मे जो भी छायावाद निकला वो प्रस्तुत है.

Friday, January 14, 2005

बुल्लेया की जाणां मैं कौण

(बुल्ला क्या जानूं मैं कौन?)

हाल ही में बाबा बुल्ले शाह कि ये काफ़ी फ़िर से सुर्खियों मे है, या यों बोलें की काफ़ी गा देने की वजह से एक नया कलाकार, रब्बि शेरगिल सुर्खियों मे है. मुझे तो वडोली बन्धु द्वारा गाया गया शास्त्रीय और आँचलिक या लोक संस्करण ज्यादा भाता है. दोनो कि कडियां, काफ़ी का टूटा-फ़ूटा हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है. अनुवाद मे गलती की संभावना है इस लिये पहले ही माफ़ी मांग लेता हूँ.

ना मैं मोमिन विच मसीत आँना
मैं विच कुफ़र दियां रीत आँ
ना मैं पाकां विच पलीत आँ
ना मैं मूसा न फरौन.

ना में मस्जिद में आस्था रखने वाला हूं
ना में ढोंगी कर्मकाण्डी हूं (अर्थ तान्त्रिक से भी लिया जा सकता है)
ना मैं शुद्ध ना अशुद्ध हूँ
ना मैं मूसा ना फ़रौन हूँ

बुल्ला की जाणां मैं कौण

ना मैं अन्दर वेद किताब आँ,
ना विच भन्गां न शराब आँ
ना विच रिन्दां मस्त खराब आँ
ना विच जागां ना विच सौण

ना मैं वेद ना कुरान पढने वाला
ना भांग ना शराब पीने वाला
ना मैं शराबीयों में मस्तवाला
ना जागों में ना सोने वाला

बुल्ला की जाणां मैं कौण

ना विच शादि ना गमनाकि
ना मैं विच पलीति पाकि
ना मैं आबि ना मैं खाकि
ना मैं आतिश ना मैं पौण

ना खुशों ना नाखुश हूँ
ना स्वच्छों में ना अस्वच्छ हूँ
ना पानी का ना मिट्टि का हूँ
ना अग्नि ना वायू से जन्मा हूँ

बुल्ला की जाणां मैं कौण

ना मैं अरबि ना लहोरि
ना मैं हिन्दि शेहर नगौरि
ना हिन्दु ना तुरक पेशावरि
ना मैण रेहन्दा विच नादौण

ना अरबी ना लहौरी
ना हिन्दिभाषी नगौरी
ना हिन्दू ना तुर्क पेशावरी
ना मेइं नादौन का वासी हूँ

बुल्ला! कि जाणा मैं कौण

ना मैं भेद मज़हब दा पाया
ना मैं आदम हव्वा जाया
ना मैं अपणा नाम धराया
ना विच बैट्ठण भौंण

ना मैं धर्म का भेद पाया
ना मैं आदम-हव्वा जाया
ना मैं अपना नाम रखवाया
ना मैं जड ना चलायमान हूं

बुल्ला की जाणां मैं कौण

आव्वल आखिर आप नु जाणां
ना कोइ दूजा होर पेहचाणां
मैंथों होर न कोइ सियाणा

स्वयं को आदी आन्त जाना
और दूजा ना कोई जाना
मुझसा सयाना कौन?

बुल्ला शाह खडा है कौण
बुल्ला शाह नामक कौन खडा है!

Thursday, January 13, 2005

दीवार में एक खिडकी रहती थी

(मेरी एक प्रिय किताब के बारे में)
वर्ष १९९९ में साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त कृति

विनोदकुमार शुक्ल की प्रारंभिक कहानियों ने ही सचेत पाठकों को चौकन्ना कर दिया था और उसके बाद "नौकर की कमीज" ने पिछले कुछ वर्षों में आखिरकार अपना कालजयी दर्ज़ा स्विकार करवा ही लिया.

उपन्यास के केन्द्र में एक निम्न मध्यमवर्गीय, कस्बाई नवदम्पत्ति है. रघुवर प्रसाद कस्बे से लगे हुए महाविद्यालय में गणित के सव्यसाची व्याख्याता हैं, जिनके जीवन में कोई गणित नही है, और नवोढा सोनसी सिर्फ़ गिरस्ती सँभालती है. दोनो के पितृ-परिवार हैं, रघुवर का परिवार ज्यादा मौजूद है. महाविद्यालय जाने के दो विकल्प हैं - टेम्पो या सईकिल, लेकिन अपने हाथी के साथ एक साधू एक अनोखा, नियमित विकल्प पैदा कर देता है जो आदमी और आदमी, मानव और पशु के बीच एक अनिर्वचनीय रिश्ते में बदल जाता है. दीवार में जो खिडकी है उसे फ़ाँद कर सिर्फ़ रघुवर प्रसाद और सोनसी नदी, तालाब, चट्टान, तोतों, बंदरो, नीलकंठों, पेडों, पहाडियों के एक गीतात्मक, स्वप्न-जैसे संसार में प्रवेश कर सकते हैं जिसमें कपडे धोना, नहाना और सो जाना तथा प्रेम कर पाना भी संभव है, जिसमें एक चायवाली बुढिया है जो बेखबर निद्रामग्नों को उढाती भी है और सोनसी को कीमती कड़ै भी दे सकती है. लेकिन खिडकी के पीछे की ये दुनिया भले विभागाध्यक्ष को कभी दिखाई तक नही देती, प्राचार्य चपरासियों और चोरी गई साईकिलों में ही चिंतित हैं, जबकि रघुवर प्रसाद के माता-पिता और बहुत छोटे भाई के लिये अपने कस्बे से अपने मददगार कमाऊ बेटे-भाई के इस कस्बे तक की यात्राएँ और एकाध बार हाथी पर सवारी ही इस एक कमरे के सामने वाला संसार है.

विनोदकुमार शुक्ल के इस उपन्यास में कोई महान घटना, कोई विराट संघर्ष, कोई युग-सत्य, कोई उद्देश्य या संदेश नहीं है क्योंकि इसमें वह जीवन, जो इस देश की वह जिंदगी है जिसे किसि अन्य उपयुक्त शब्द के अभाव में निम्नमध्यमवर्ग कहा जाता है, इतने खलिस रूप में मौजूद है कि उन्हें किसि पिष्टकथा की ज़रूरत नही है. यहाँ खलनायाक नही हैं किन्तु मुख्य पात्रों के अस्तित्व की सादगी, उनकी निरीहता, उनके रहने आने-जाने, जीवन-यापन के वे विरल ब्यौरे हैं जिनसे अपने आप उस क्रूर प्रतिसंसार का अहसास हो जाता है जिसके कारण इस देश के बहुसंख्य लोगों का जीवन का जीवन वैसा है जैसा की है. विनोदकुमार शुक्ल इस जीवन में बहुत गहरे पैठकर दाम्पत्य, परिवार, आस-पडोस, काम की जगह, स्नेहिल गैर-संबंधियों के साथ रिश्तों के जरिए एक इतनी अदम्य आस्था स्थापित करते हैं कि उसके आगे सारे अनुपस्थित मानव-विरोधी ताकतें कुरूप ही नही, खोखली लगने लगती हैं. एक सुखदतम अचंभा यह है कि इस उपन्यास में अपने जल, चट्टान, पर्वत, वन, वृक्ष, पशुओं, पक्षियों, सूर्योदय, सूर्यास्त, चन्द्र, हवा, रंग, गन्ध और ध्वनियों के साथ प्रकृति इतनी उपस्थित है जितनी फ़णीश्वरनाथ रेणू के गल्प के बाद कभी भी नही रही और जो ये समझते थे कि विनोदकुमार शुक्ल में मानव-स्नेहिलता कितनी भी हो, स्त्री-पुरुष प्रेम से वे परहेज करते हैं या क्योंकि ये उनके बूते के बाहर है, उनके लिये तो ये उपन्यास एक सदमा साबित होगा-प्रदर्शनवाद से बचते हुए इसमें उन्होंने ऐन्द्रिकता, माँसलता, रति और श्रिंगार के ऐसे चित्र दिए हैं जो बगैर उत्तेजक हुए आत्मा को इस आदिम संबंध के सौंदर्य से समृद्ध कर देरे हैं, और वे चस्पाँ किए हुए नही हैं बल्कि नितांत स्वाभाविक हैं - उनके बिना यह उपन्यास अधूरा, अविश्वसनीय, वंध्य होता.

भाषा पर तो विनोदकुमार शुक्ल का अपने ढंग का अघिकार है ही-प्रेमचंद और जैनेन्द्र के बाद इतनी सादा, रोज़मर्रा भाषा में शायद ही किसि और में अभिव्यक्ति की ऐसी क्षमता हो- लेकिन इस उपन्यास में उन्होंने संभाषण की कई भाषाएं और शैलियाँ ईजाद की हैं - एक वह है जिसमें रघुवर प्रसाद लोगों से बोलते हैं, दूसरी वह जिसमें वे खुद से बोलते हैं, तीसरी वह जिसमें रघुवर प्रसाद और सोनसी अपने एकांत मे बोलते हैं और चौथी वह है जिसमें रघुवर प्रसाद परिवार आपस में बात करता है, जिसमें हल्की-सी आँचलिकता मिली हुई है, और पाँचवी वह जिसमें विभागाध्यक्ष और प्राचार्य बोलते हैं- सबसे 'ठेठ' वही है. एक और अद्भुत भाषा वह है जिसमें बोलने वाला और सुननेवाला बारी-बारी कहते कुछ और हैं और सुनते कुछ और हैं और यह एक और ही अर्थबाहुल्य स्निग्घता को जन्म देता है.
यह उपन्यास मर्मस्पर्शिता और परिहास का निराला संतुलन है.

Wednesday, January 12, 2005

पहला प्यार

अनुगूंज में पहले प्यार कि किस्साबयानी के हुनर देख कर ईर्ष्या सी हुई. वो तो नसीब कि जनता ने कविता वगैरह नही पेली! मेरे नसीब, आपके नहीं! क्योंकि पहले प्यार की बात आते ही हमार मालवी दिल कविता करने को चाहे सो अब झेलो. प्यार किसि भी व्यवस्था में अपना तन्त्र स्थापित कर लेता है इस्सी बात को कहने का प्रयत्न किया है गौर से मुलाहिजा फ़रमाईएगा -

इक गाँव की गोरी से प्रीत कर बैठे
उल्टी हम जीवन की हर रीत कर बैठे

लोटा ले के जंगल जाते थे अल-सुबह
इक झाडी में उसको देखा, दो ईंट पर बैठे

शर्माई वो घबराई ताम्र लोट लुढकाई
हम अपना लोटा दे के, बस पीठ कर बैठे

इक गाँव की गोरी से प्रीत कर बैठे
उल्टी हम जीवन की हर रीत कर बैठे

मिली लौटा लौटाने हिया लोटे लगाने
जम्माल-घोटा पी के हम नींद कर बैठे

खिली प्रेम कि फ़ुल्वारी सोन खाद डारी
एक ही झाडी में ज़रा दूर दूर बैठे.

इक गाँव की गोरी से प्रीत कर बैठे
उल्टी हम जीवन की हर रीत कर बैठे

Akshargram Anugunj

अब आगे की बात याद कर के गुस्सा आ गया है अत: कविता बन्द. गोरी के पिता ने घर मे ही ताम्र-लोट प्रयोग की उचित सुलभ-व्यवस्था का निर्माण करा प्रेम-प्रक्रिया मे अवरोध डाला और बाद मे उसी ठेकेदार से गोरी का विवाह तय कर दिया. हाल ही में पता चला की गोरी ने अपने जुडवां पुत्र-पुत्रि का घरेलू नाम फ़्लशी और टिश्यु रखा है.

जंगल, झाडी का स्थान, जम्माल-घोटे कि मात्रा, लोटे का आकार प्रकार जैसे व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर नही दिए जायेंगे.

Sunday, January 09, 2005

सनकाऊ वक्तव्य

१. गरीबी - पैसे के अन्त मे बचा हुआ माह का हिस्सा.
२. पागलपन तेरी दशा नही है, तेरी मौज है.
३. आज का दिन आपकी अब तक की जिंदगी का आखरी दिन है.
४. क्या भगवान आप में आस्था रखता है?
५. स्वर्गवासी होने तक यहां आपका स्वागत है.
६. शायद मैं इस ग्रह से उतर नही पाऊंगा.
७. जीवन एक यौन संक्रमित बिमारी है और ये १००% आपकी जान ले लेगी.
८. इस पागल संसार मे समझ का क्या काम?
९. कायदे औसत आदमी के लिए हैं - मै तो अव्यव्स्था को भी समझ सकता हूं.
१०. जीवन गूँ का भंरवा पराठा, जितनी ज्यादा आटा-दाल उतना कम गूँ.
११. जब भी कोई अच्छी किताब पढो, अपने शिक्षक को धन्यवाद कहो, अगर वो अपना फोन नम्बर बदल कर असूचित ना करा ले.
१२. इतिहास खुद को दोहराता है क्योंकि तुम एक बार मे सुनते नहीं हो.

Saturday, January 08, 2005

साँड विचार

साँड मेरा प्रिय पशु है, बचपन से मुझे साँड मे जो बात नज़र आती है किसि और पशु मे नहीं. घोडा सुन्दर है, साधा जा सकता है, साँड शाकाहारी है पर साधा नही जा सकता. साँड को बैल बनाने कि कोशिश की जा सकती है मगर बैल के अन्दर फिर भी थोडा सा साँड बचा रहता है - भरोसा ना हो तो बैल पाल के देख लो!

कृष्ण के रथ मे सात घोडे थे सात साँड नहीं. कृष्ण को गाय प्रिय थी वो गाय को घांस चराने ले के जाते थे. साँड बहुत ही आत्म-निर्भर होता होगा, खुद चर लेता होगा, या कभी-कभी मुझे ये साँड को पटाने कि कृष्ण कि सजिश लगती है. फिर कौन जाने कृष्ण और साँड मे मित्रता रही हो जंगल मे जा के कृष्ण गोपियों मे मस्त और साँड गैय्या में. फिर भी साँड के बजाए घोडे ही जोतने पडे, ये साँड होने की महिमा हो सकती है. कृष्ण ऐसी हरकतों की वजह से ही अपने समय मे बडे कूल थे!

शेयर मारकिट मे जब भूचाल आता है तब इसे साँडिया-बज़ार बोलते है. हिन्दि का शब्द अण्ड-सण्ड, साण्ड के साण्ड्त्व के सत्व की तरफ का इशारा है - समझ जाईये. जवानी में हमारी बाईक के पीछे 'अण्ड-सण्ड-प्रचण्ड' लाल रँग मे लिखवा कर बहुत फर्राये हम, शायद थोदा सँडियाये भी होंगे - याद नही, याद होगा तो भी लिखुंगा नहीं.

आज साँड पे लिखने कि क्यों सूझी? अभी सप्ताह भर की सब्जी खरीद के लौटा हूं और अन्तर्यामिणी से बोला, 'साँड को साधने कि एक ही विधि है - उसका ५ दिनि समरोह कर के परिणय कर दिया जाये ... काश ये बात कृष्ण को सूझी होती, तो महाभारत मे उनके सप्त-साँडिये रथ की धमाकेदार एन्ट्री पे ही युद्ध का पट-क्षेप हो जाता.' अन्तर्यामिणी बात का सन्दर्भ और प्रसंग खुद समझिं, जवाब ये मिला कि 'कृष्ण को युद्ध करवाना था और जीतना था, एक दिशा देनी थी. इसीलिये कृष्ण ने सधे हुए कर्मठ घोडों पे महाभारत मे एन्ट्री मारी. ठसियल दिशाहीन साँडों को उनकी चारागाहों में चरता छोड दिया, साँड होने का यह पुरुस्कार है या दण्ड, आप के मत पर निर्भर है'.

जवाब सुनते ही मैं विक्रम-और-बेताल के बेताल कि तरह उडा और अपने पी.सी. पे बैठ गया.

Wednesday, January 05, 2005


कहते हैं आदमी का काम कभी पूरा नही होता. पर एक काम सिरे लगा. हिन्दी युनिकोड फोरम पे कैसे इस्तेमाल हो सकता है इस का जायजा लिया गया आगे जो हो सो हो - गेन्द अब पराये पाले मे है, जिसको जमे उपयोग करो!
हिंदी ब्लॅग वालो से निवेदन है - हिन्दी मे जवाब देने के इस टूल को ब्लॅग मे भी घुसेडने की प्रक्रिया पे विचार हो सके तो वाह - अपन इस गेम मे नये हैं मदद करो यार लोग - ये कट-पेस्ट कि झन्झट खतम हो!
परेशानियां तकनीकी नही हैं उत्साह की हैं. सब कुछ तुरत-फुरत चहिये ज़माने को और आलोकजी जैसे कर्णधार को तो आलोचनाऒ / प्रशंसाऒ को एक सा झेलने की आदत हो गई होगी! वाह रे ज़माने एक चर्चिले ने इन को भी नही बख्शा! नया क्या है दस्तूर!

HUG 3.1 Beta Online Forum Simulation View Released ready to test!

Monday, January 03, 2005

जन गण मन

तो साहब अन्य अनिवासी भारतीयों के साथ मनाया नया साल. हम भी भांगडे के अलावा पाश्चात्य धुनों पर थिरके. सुरा, सिगार, संगीत, सर-दर्द. बीच रात मे अपनी बारह बज गई और नया साल घोषित, उसके पहले उल्टी गिनती वगैरह.

समापन के समय एक पिए हुए को देश प्रेम जागा, बिना सावधान किए "जन गण मन" शुरु. अपन को राम भरोसे हाईस्कूल के हेड मास्साब की कसम, खटाक से सावधान कि गियर लगाई. पास खडी एक महिला ने ऐसे मूह बनाया मानो हमने अपनी ढुँगन खुजा दी हो, फ़िर सम्भल के जैसे तैसे मिले सुर मेरा तुम्हारा - दीदे घुमा के देखा दो हरित पत्र धारी धौल-धप्पा कर रहे है. एक कोने पे उसकी पत्नी/प्रेयसी के नितम्ब पर हाथ रखे 'जय जय जय जय है' अलापा. हमको आखिर में "भारत माता कि... जै" करनी थी ... नही हुई. अल्बत्ता तालियां बजाई गईं. सब सही है, चल्ता है!

उसके पहले शाम रंगारंग थी ... कजाने-केसे कसैली लगने लगी निगोडी, अपना मू सूमडे सरीका हो गया! अन्दर का मालवावासी अपने ईस्कूल का चक्कर लगा आया. चाए 'जन्गन्मन' होता था पर शब्द भोले दिल से निकलते थे सावधानी से.

हमने निःश्वास छोडी .. "नाच नाच कर थक गये यार!"