Saturday, January 08, 2005

साँड विचार

साँड मेरा प्रिय पशु है, बचपन से मुझे साँड मे जो बात नज़र आती है किसि और पशु मे नहीं. घोडा सुन्दर है, साधा जा सकता है, साँड शाकाहारी है पर साधा नही जा सकता. साँड को बैल बनाने कि कोशिश की जा सकती है मगर बैल के अन्दर फिर भी थोडा सा साँड बचा रहता है - भरोसा ना हो तो बैल पाल के देख लो!

कृष्ण के रथ मे सात घोडे थे सात साँड नहीं. कृष्ण को गाय प्रिय थी वो गाय को घांस चराने ले के जाते थे. साँड बहुत ही आत्म-निर्भर होता होगा, खुद चर लेता होगा, या कभी-कभी मुझे ये साँड को पटाने कि कृष्ण कि सजिश लगती है. फिर कौन जाने कृष्ण और साँड मे मित्रता रही हो जंगल मे जा के कृष्ण गोपियों मे मस्त और साँड गैय्या में. फिर भी साँड के बजाए घोडे ही जोतने पडे, ये साँड होने की महिमा हो सकती है. कृष्ण ऐसी हरकतों की वजह से ही अपने समय मे बडे कूल थे!

शेयर मारकिट मे जब भूचाल आता है तब इसे साँडिया-बज़ार बोलते है. हिन्दि का शब्द अण्ड-सण्ड, साण्ड के साण्ड्त्व के सत्व की तरफ का इशारा है - समझ जाईये. जवानी में हमारी बाईक के पीछे 'अण्ड-सण्ड-प्रचण्ड' लाल रँग मे लिखवा कर बहुत फर्राये हम, शायद थोदा सँडियाये भी होंगे - याद नही, याद होगा तो भी लिखुंगा नहीं.

आज साँड पे लिखने कि क्यों सूझी? अभी सप्ताह भर की सब्जी खरीद के लौटा हूं और अन्तर्यामिणी से बोला, 'साँड को साधने कि एक ही विधि है - उसका ५ दिनि समरोह कर के परिणय कर दिया जाये ... काश ये बात कृष्ण को सूझी होती, तो महाभारत मे उनके सप्त-साँडिये रथ की धमाकेदार एन्ट्री पे ही युद्ध का पट-क्षेप हो जाता.' अन्तर्यामिणी बात का सन्दर्भ और प्रसंग खुद समझिं, जवाब ये मिला कि 'कृष्ण को युद्ध करवाना था और जीतना था, एक दिशा देनी थी. इसीलिये कृष्ण ने सधे हुए कर्मठ घोडों पे महाभारत मे एन्ट्री मारी. ठसियल दिशाहीन साँडों को उनकी चारागाहों में चरता छोड दिया, साँड होने का यह पुरुस्कार है या दण्ड, आप के मत पर निर्भर है'.

जवाब सुनते ही मैं विक्रम-और-बेताल के बेताल कि तरह उडा और अपने पी.सी. पे बैठ गया.

6 comments:

Kalicharan said...

bhadiya likhe ho saand ki mahima per. Saand ki ek visheshta aur hai

Saand jaab apni per aata hai to acche acchon ki gaand phat jati hai

Raman said...

पहली बार सांड के बारे में लेख पढ़ा .. हिन्दी चिट्ठा लेखन में वैरायटी बढ़ रही है ...

आलोक said...

हमें हमेशा गाय पर ही दस पङ्क्तियाँ क्यों लिखवाते थे?

आलोक said...

साँड मर गए थे क्या?

डा० अमर कुमार said...

इतने दिनों के हिंदी ब्लागिंग अनुभव में
अब साँड़ों का महत्व समझ में आने लगा होगा, है कि नहीं ?

विवेक सिंह said...

लेख पढ़कर लगा जैसे मैंने लिखा हो !