Thursday, January 13, 2005

दीवार में एक खिडकी रहती थी

(मेरी एक प्रिय किताब के बारे में)
वर्ष १९९९ में साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त कृति

विनोदकुमार शुक्ल की प्रारंभिक कहानियों ने ही सचेत पाठकों को चौकन्ना कर दिया था और उसके बाद "नौकर की कमीज" ने पिछले कुछ वर्षों में आखिरकार अपना कालजयी दर्ज़ा स्विकार करवा ही लिया.

उपन्यास के केन्द्र में एक निम्न मध्यमवर्गीय, कस्बाई नवदम्पत्ति है. रघुवर प्रसाद कस्बे से लगे हुए महाविद्यालय में गणित के सव्यसाची व्याख्याता हैं, जिनके जीवन में कोई गणित नही है, और नवोढा सोनसी सिर्फ़ गिरस्ती सँभालती है. दोनो के पितृ-परिवार हैं, रघुवर का परिवार ज्यादा मौजूद है. महाविद्यालय जाने के दो विकल्प हैं - टेम्पो या सईकिल, लेकिन अपने हाथी के साथ एक साधू एक अनोखा, नियमित विकल्प पैदा कर देता है जो आदमी और आदमी, मानव और पशु के बीच एक अनिर्वचनीय रिश्ते में बदल जाता है. दीवार में जो खिडकी है उसे फ़ाँद कर सिर्फ़ रघुवर प्रसाद और सोनसी नदी, तालाब, चट्टान, तोतों, बंदरो, नीलकंठों, पेडों, पहाडियों के एक गीतात्मक, स्वप्न-जैसे संसार में प्रवेश कर सकते हैं जिसमें कपडे धोना, नहाना और सो जाना तथा प्रेम कर पाना भी संभव है, जिसमें एक चायवाली बुढिया है जो बेखबर निद्रामग्नों को उढाती भी है और सोनसी को कीमती कड़ै भी दे सकती है. लेकिन खिडकी के पीछे की ये दुनिया भले विभागाध्यक्ष को कभी दिखाई तक नही देती, प्राचार्य चपरासियों और चोरी गई साईकिलों में ही चिंतित हैं, जबकि रघुवर प्रसाद के माता-पिता और बहुत छोटे भाई के लिये अपने कस्बे से अपने मददगार कमाऊ बेटे-भाई के इस कस्बे तक की यात्राएँ और एकाध बार हाथी पर सवारी ही इस एक कमरे के सामने वाला संसार है.


विनोदकुमार शुक्ल के इस उपन्यास में कोई महान घटना, कोई विराट संघर्ष, कोई युग-सत्य, कोई उद्देश्य या संदेश नहीं है क्योंकि इसमें वह जीवन, जो इस देश की वह जिंदगी है जिसे किसि अन्य उपयुक्त शब्द के अभाव में निम्नमध्यमवर्ग कहा जाता है, इतने खलिस रूप में मौजूद है कि उन्हें किसि पिष्टकथा की ज़रूरत नही है. यहाँ खलनायाक नही हैं किन्तु मुख्य पात्रों के अस्तित्व की सादगी, उनकी निरीहता, उनके रहने आने-जाने, जीवन-यापन के वे विरल ब्यौरे हैं जिनसे अपने आप उस क्रूर प्रतिसंसार का अहसास हो जाता है जिसके कारण इस देश के बहुसंख्य लोगों का जीवन का जीवन वैसा है जैसा की है. विनोदकुमार शुक्ल इस जीवन में बहुत गहरे पैठकर दाम्पत्य, परिवार, आस-पडोस, काम की जगह, स्नेहिल गैर-संबंधियों के साथ रिश्तों के जरिए एक इतनी अदम्य आस्था स्थापित करते हैं कि उसके आगे सारे अनुपस्थित मानव-विरोधी ताकतें कुरूप ही नही, खोखली लगने लगती हैं. एक सुखदतम अचंभा यह है कि इस उपन्यास में अपने जल, चट्टान, पर्वत, वन, वृक्ष, पशुओं, पक्षियों, सूर्योदय, सूर्यास्त, चन्द्र, हवा, रंग, गन्ध और ध्वनियों के साथ प्रकृति इतनी उपस्थित है जितनी फ़णीश्वरनाथ रेणू के गल्प के बाद कभी भी नही रही और जो ये समझते थे कि विनोदकुमार शुक्ल में मानव-स्नेहिलता कितनी भी हो, स्त्री-पुरुष प्रेम से वे परहेज करते हैं या क्योंकि ये उनके बूते के बाहर है, उनके लिये तो ये उपन्यास एक सदमा साबित होगा-प्रदर्शनवाद से बचते हुए इसमें उन्होंने ऐन्द्रिकता, माँसलता, रति और श्रिंगार के ऐसे चित्र दिए हैं जो बगैर उत्तेजक हुए आत्मा को इस आदिम संबंध के सौंदर्य से समृद्ध कर देरे हैं, और वे चस्पाँ किए हुए नही हैं बल्कि नितांत स्वाभाविक हैं - उनके बिना यह उपन्यास अधूरा, अविश्वसनीय, वंध्य होता.


भाषा पर तो विनोदकुमार शुक्ल का अपने ढंग का अघिकार है ही-प्रेमचंद और जैनेन्द्र के बाद इतनी सादा, रोज़मर्रा भाषा में शायद ही किसि और में अभिव्यक्ति की ऐसी क्षमता हो- लेकिन इस उपन्यास में उन्होंने संभाषण की कई भाषाएं और शैलियाँ ईजाद की हैं - एक वह है जिसमें रघुवर प्रसाद लोगों से बोलते हैं, दूसरी वह जिसमें वे खुद से बोलते हैं, तीसरी वह जिसमें रघुवर प्रसाद और सोनसी अपने एकांत मे बोलते हैं और चौथी वह है जिसमें रघुवर प्रसाद परिवार आपस में बात करता है, जिसमें हल्की-सी आँचलिकता मिली हुई है, और पाँचवी वह जिसमें विभागाध्यक्ष और प्राचार्य बोलते हैं- सबसे 'ठेठ' वही है. एक और अद्भुत भाषा वह है जिसमें बोलने वाला और सुननेवाला बारी-बारी कहते कुछ और हैं और सुनते कुछ और हैं और यह एक और ही अर्थबाहुल्य स्निग्घता को जन्म देता है.
यह उपन्यास मर्मस्पर्शिता और परिहास का निराला संतुलन है.

1 comment:

अनूप शुक्ला said...

दोनों किताबें मैंने पढी हैं.आपने अच्छा लिखा.दीवार में ....के लिये धीरज चाहिये जो शायद आम पाठक के पास नहीं होता.बहुत अच्छा लगा देखकर कि आपका टूल यहां आ गया .मैंने दोस्त से बात की थी यही इन्त्जाम कर्ने को.यहां हो गया पहले ही बधायी.