Sunday, June 05, 2005

Iran-Pak-India gas pipeline project - KEEP OUT USA!

Damn, I am confused – I don’t want to be happy yet – this cannot be true, I love this pessimism – I am comfortable settled in it! Right now in the pants of my mind, “what the heck” is reaching the levels of “what the F&$*”!! What is going on really?

Wait a min! … Are our politicians brewing the perfect recipe for unrest in the region again? Are India and Pak serious? REALLY talking about our national interests without America’s consent? Wow, are there symptoms of us hitting our diplomatic age of puberty? Un-‘F’-ING-believable! This cannot be true!!

USA Inc., the control freak it is, wants its share in everything traded on the globe. Either some American corporate has to be involved via its technology or services or products or some other form of making money. Any trade any level –period.

America is especially interested in Energy, Banking and Conglomerates. Weapons? Hmm – we don’t trade them in malls – right. On a bigger army level –that’s on the top of the list!

How can a $4bn ENERGY deal go in Asia without the consent and Involvement of USA!

Ideally how this should have been done? Les see - After Iraq, USA would attack Iran (on the basis of same ‘old WMD bullsh!t), then America will have all of Iran’s oil too and American companeis would built the pipeline on our lands, Shell gas stations in out neighbourhoods and India, Pak would become its perfect markets! Everybody is happy – right!! Now big brother is getting pissed – for all the good reasons and sh!t will hit the fan!!!

India is getting ready for Iran-Pak-India gas pipeline project – This deal does not fit the bigger American plan! Though this news may be music to many ears, what happened to Desi-Paki puppets dance on the American country music tunes! Traditionally, in our part of the world politicians trade national interests for power quicker than the prostitutes trade their flash for money. This project has been in discussions for decades but nothing materialized simple because India and Pakistan were busy kicking each other’s balls!

If this project materializes, it can bring these nations together and can be as important as out historic trade routes – America for sure won’t like to see that happen!

An inforamtive article about India’s oil demand & supply

America has not been happy about all this, India has not buzzed so far!

As soon as some proxy peace (hey if there can be proxy war, there can be proxy peace too!) India offered to sell diesel to Pakistan on discounted price, this is a big diplomatic initiative. Finally, a well awaited the recent google news which inspired this post

Is this possible? Can we do this? If we fail to materialize this project and USA ends up doing what we want to do on our own – It would give us one more reason to hate USA and that’s about it, we will end up becoming a market instead of a project partner. I am afraid that may happen!

Thursday, May 26, 2005


Truth and fact, perspective and reality, hope and denial, justice and revenge; I can keep going. Things are not what they appear to be.

Comfort zones, that’s what we create; Rational comfort zones, we kind of prefabricate them for our own ease. I go ahead and have fun pretending to philosophize, nothing but rearranging the words, sometimes wondering how easy it is to use words as tools to create "social comfort zones". Simple renaming does miracles, when gambling becomes gaming the associated sense of guilt fades away.

If I was a novelist I could have written something with the title “Let them die in their comfort zone(s)” – I think it’s a fun title. To me “Let them live in their comfort zone(s)” is a more sinful thought – it does not feel good on many levels - what if they live forever! Or perhaps it is my hidden sadistic side, which would not like to see them in their comfort zone, mind plays its trick and I feel better violating the zone! Its fun to bullshit like this!!

Pushing buttons is what it is called. Purpose? Making them uncomfortable about something? Not really, the real purpose is to get some attention. Why analyze? It is quite simple actually.

“Let the die in their comfort zone” is for sure a better title for a book – leave them alone till death. Leave them with their perspectives, with their hopes and with their prejudices. Know in your heart that finally they will be free – in a natural course, sometime on the timeline – without knowing the difference or its knowledge.

I know this is quite impressionistic; I have had my fare share of realism for the day anyways! f@#* This one is the worst ever!

Sunday, March 27, 2005

ई-स्वामी की ई-छप्पर

मालवीमानुस आलसी नही होते, आरामपसंद होते हैं. आलसी के पास काम होता है और वो करता नही, हम काम पैदा ही ना हो इस योग के साधक हैं - निष्काम-योग की परिभाषा मालवी संस्कृती जरा अलग तरीके से समझी है. अब क्या करें साहब, बम्मन लोगों ने संस्कृत के पेटेंट ले कर सब गडबड कर रखा था ना.

लोकल संतन का कथन है - फिरी का चंदन घिस मेरे नंदन, सो, हम blogspot पर कई मौसम पडे रहे, आगे भी पडे रह सकते थे चाहते तो और अतिक्रमण भी कर सकते थे! मगर अब हम अच्छी लोकेलिटी में रह कर अभिजात्य हुआ चाहते है, वैसे ये पता पुश्तैनी रेफ़रंस जैसा संभाल के रखेंगे - जैसे हमरे दादा जी दूसरे बुजुर्गों को वो हमेशां किस पिण्ड(गांव) से है, बताते थे!

ई-स्टोरी ये है की, जैसे-तैसे हिंदिनी के पिछवाडे फ़िलहाल एक छप्पर अपने लिए भी तान दिये हैं, तो अब वहीं मिलेंगे! रस्ता है इधर से.

Saturday, March 12, 2005

बेचारा लल्लू!

पुरुष और स्त्री अलग अलग प्रकार के जीव हैं और दोनों एक दूसरे की खोपडी की कार्यप्रणाली समझ सकें इस लिए हजारों पुस्तकें उपलब्ध हैं - ठीक है साहब, अगर प्रेम कम है और दिल का काम दिमाग से ही लिया जाना है तो किताब पढ कर निभा लो.

अब इधर समान अधिकार पाने के मामले में पश्चिमी कोमलांगियाँ साक्षात रणचण्डी की प्रतिमूर्ती होती हैं - लिंग-भेद कानूनन अपराध है मगर जेंडर-प्रोफाईलिंग या लिंगाधारित विभेदन जोरदार होता है - विसंगतियाँ आह-और-वाह सी साथ साथ बहती हैं. तो स्त्री पुरुष अलग अलग प्रकार के जीव हैं वो कोमल हैं और संवेदनशील भी और हम अपरिष्कृत ढीठ हैं - धन्यवाद! मगर मरद की मजाल जो "अपवाद भी तो होते हैं" इतना भी बोल कर भाग पडे! अब १८-२५ साल की उम्र का पुरुष ज्यादा कार इन्शोरेंस दर देता है तब कोई स्त्री आ कर नही कहती की भई हम भी तेज भगाते हैं और सेल फ़ोन पे खी-खी करते हैं!

स्त्रीत्व का रंग गुलाबी है अगर पुरुष गुलाबी रंग पहन ले - हा-हा-कार! स्त्री भावुक फिल्में ही पसंद करती हैं और पुरुष मारपिटाई वाली, फ़ाडू-डरावनी-भूतहा, फुटबाल-सिरफुटव्वल-बाक्सिंग इत्यादी. चलो सिनेमा तक ठीक है की आप चहे जो हांक लो पर इधर और हजारों तरीके हैं जेंडर प्रोफ़ाईलिंग के जिनमे से लगभग सारे ही पुरुषों के ही खिलाफ़ जाते हैं!

हकीकत - सब बकवास बात है, आम तौर पे जितनी डरावनी पश्चिम की नारी होती है या पश्चिमीकृत भारतीय मूल की बालाएं होती हैं शायाद ही कोई और जीव होता हो. समाज नही है जसपाल भट्टी के उल्टा-पुल्टा का सीधा प्रसारण है साला! पर यार पुरुष भी ना, स्त्री-पुरुष संबंधों के मामले में कई काठ के उल्लू तो बहुत ही खुन्नस दिला देते हैं कसम से अब इन डायनिकाओं को भी पूरा दोष नही लगा सकते! एक केस स्टडी लो -

हाल ही में अँतर्यामिणी की मित्रता एक ऐसी ही डायनिका से हो गई है. वो हमारे यहाँ दो दिन के लिए सपति पधारीं - अब तक इस भारतीय एच-4 धारीणीं और उसके लल्लू मिय़ाँ द्वारा हमारे घर में उनकी आपसी चुम्मा-चाटी, गलबहिंयाँ डाले ही बैठना, पतीदास द्वारा पत्नी के पैर दबाना - फुट-मसाज देने के नाम पर इत्यादी क्रिया कलाप देख चुका हूँ. प्रेम का सार्वजनिक प्रदर्शन चल रहा है - बढिया है. भई आपसी सेवा होनी चाहिए. पत्नी के पैर दुख रहे हैं या नही पर् पति दबा रहा है - सुंदर दृश्य हो सकता है पत्नी पति की गोद में पैर रख के लेटी है, और वो फ़ुट मसाज दे रहा है इधर हम बैठे हैं नजारा देख रहे हैं - देखो इसे बोलते हैं आत्मसमर्पण! मुझे भी ना पता नही कैसे कैसे असमय विचार आते हैं, याद आ रहा है अगर किसी जीव को अनजाने पैर लग जाता था तो हमारे गाँव मे छू कर माफी माँग ली जाती थी, चलिए पति-पत्नी अलग मामला रहा और माना आप हमें इतना अपना मान रहे हैं की हमारा घर भी अपना लग रहा है अहोभाग्य अतिथिदेव-देवी परन्तु आखिर इस प्रेम-प्रदर्शन की सीमा रेखा क्या है? खयाल आया और आ कर चला गया. पैर दबते रहे - कोडेक मोमेंट, कैसे खीँचू और जवान के बाप को पहुचाउँ वाह बाउजी क्या प्रेमी सँतानें हैं कसम से - जहां जाती हैं प्रेम करती हैं.

मैडम की बातें, इन को लोगों को एनालाईज़ करने का शौक है, अभी एच-4 पे काम नही कर सकती हैं. अपने आस-पास के लोगों पर राय प्रकट करती हैं लल्लूपति निहाल हैं इनकी इस काबिलियत पर, बताते हैं दफ्तर का कोई भी निर्णय मैडम से पूछे बिना नही लेते - इस को बोलते हैं सहचारिणीं. मैडम दियाँ गल्लाँ, ये हर एक से ऊपर हैं - एमबीए कर के आई हैं. जय हो! जय हो!! अपन भी ढीठ हैं, स्याने भी - एक चुप सौ सुख. लल्लू को सीख नही दे सकते की बेटा पीठ टटोल और अपनी रीढ ढूँढ, ये प्रेम नही है मेरे लाल - मरने दो साले को!

लल्लू पढा लिखा आदमी है, बहुत चालाक और समझदार भी है, सफल भी - बहुत सफल! नेक भी है, पर यही होता है जब किसी गधा-हम्माल पढाकू के जीवन में जो पहली और एकमात्र लडकी आती है उसी पर लट्टू हो जाने पर. मूरख को लगता है किस्मत खुल गई जी वाह वाह, प्रेम पा गया - इधर समझ में आ रहा है -टाईम पर सही मुर्गा फांस लिया छोकरिया बडी तेज थी, जीनगीभर हलाल करेगी. प्रेम-विवाह - हेप्पीली मेर्रीड एवर आफ्टर!

अँतर्यामिणीं ने लल्लू के लिए मेरे मुखडे पर दुखडा देखा और डायनिका को सपति विदा करने के बाद आगे से ऐसा हृदयविदारक जोडा कभी ना आमंत्रित करने का निर्णय भी लिया. बेचारा लल्लू!

Wednesday, March 09, 2005

अक्षरग्राम अनूगूँजः सातवाँ आयोजन - बचपन के मीत

तब हमारे साथ साथ शहर बडा हो रहा होगा, मगर शहर में हो रहे बदलवों के बारे में बिल्कुल अनभिज्ञ रहे हम! बचपन का जीवन अपने स्कूल और मुहल्ले तक ही सीमित था. मध्यमवर्ग - ये शब्द कई आर्थिक सामाजिक सीमितताओं का प्रतिनिधित्व करता है और उस समय के मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे एक अनोखी समझ से अपने संसाधनो मे से मनोरंजन के साधन खोज लेते थे. खेलों के उपकरण - एक की गेंद दूसरे की बैट और टूटे फ़ाटक के स्टंप बना कर क्रिकेट शुरु! गेंद गुमाने वाले को नई गेंद ला कर देनी होती थी! गुल्ली-डण्डे की गुल्ली पर भी यही नियम लागू था. पतंगबाज़ी, कंचे-गोटिया तो कभी सात फ़र्शी पत्थर जमा कर सितोलिया खेला जाता था! गली के दोस्तों के साथ मित्रता थी पर पक्का मित्र सहपाठी ही था! Akshargram Anugunj

यह मित्र और मैं पहली कक्षा से आठवीं कक्षा तक सहपाठी रहे और पक्के मित्र भी. बचपन के इस मित्र के पिता का तबादला हुआ और ये दूसरे शहर चला गया. पिछली बार दस साल पहले मिले थे - मित्रवत प्रेम बना हुआ था. आज जब पीछे मुड के देखता हूं तो लगता है मित्र से मित्रता थी मगर हमरी मित्रता में वो गहराई नही थी जो मैने कई औरों की मित्रता में देखी है - खासतौर पर जो बचपन के मित्र होते हैं उनकी मित्रता में जो फ़ौलाद होता है - अपने केस मे नादारद रहा. मित्रता चल रही थी क्योंकी कोई परिक्षा की घडी नही आई, अगर आती तो मित्रता निपट जाती. उस के व्यक्तित्व में मेरे लिए मरने मारने पर उतारू हो जाए इतना तसीर नही था - हां मेरे मे था. अब ये किस्मत की बात होती है.

दोनो मित्रों ने साथ बहुत मस्तियां कीं - एक याद आ रही है -

हम तब सातवीं कक्षा में थे, रोज सुबह प्रार्थना होती थी. रामभरोसे हाईस्कूल में आठवीं तक डेस्क-दरी पे बिठाने का रिवाज था. तो प्रर्थना पूरी होते ही पैरों को आराम देने के लिए सब पहलू बदलते. कक्षा में एक सहपाठिनी पहलू घुटनें जरा उपर को कर के बदलती थी - ये रहस्य अपने राम खोज चुके थे - अब उस क्षणमात्र में स्कर्ट उपर होती, सहपाठिनी के लज्जा-वस्त्र के दर्शन हो जाते थे. रहस्य मित्र को बताया गया कुछ ही दिनों में मित्र और मैं प्रार्थना शुरु होने से पहले लज्जावस्त्र का रंग "गेस्स" कर के शर्त लगा चुकते थे. प्रार्थना पूरी होने का बेसब्री से इंतजार होता - बस्स प्रार्थना पूरी होते ही दोनो बडी स्टाईल से मुण्डी घुमाते - किसि को पता ना चले और लज्जावस्त्र के दर्शन पा लेते - सही!!

जो जीतता, यानी जिसका गेस्स किये हुए रंग का ही लज्जावस्त्र उस दिन पहना गया होता वो खिल जाता! दोनो में से जो हारता वो स्कूल खत्म होने पर दूसरे को समोसा खिलाता. अब अगर दोनो ही गलत निकल जाएं तो फ़िर अपने अपने पैसे की खाते. अब दोनो की रफ़ कापी के पीछे रोज पिछले दिनों पहने गए रंगो की लिस्ट होती थी - तो बाकायदा जैसे सटोरिए या लाटरीबाज कल खुलने वाले फ़िगर का कयास पिछले अंक देख कर लगाते हैं सो हम भी कुछ वैसा ही करते - "कल लज्जावस्त्र लाल था उस के एक दिन पहले भी लाल था, आज नहा कर आई है परसों काला था तो आज फ़ूलों वाली सफ़ेद पहनी होगी." और वहीं मित्र लाजिक भिडा रहा है "पिछले तीन गुरुवार से एक ही रंग - भई काला रीपीट होगा"

बडा होने के बाद जब जब प्रोबेबिलिटी, एक्स्ट्रापोलेशन और फ़ोरकास्टिंग विधियों के बारे मे कुछ भी पढा - सातवीं का किस्सा याद आया.

Thursday, March 03, 2005

ब्लागनाद काण्ड और अतुलजी के अनुगूंज प्रस्ताव का अनुमोदन

जन्नतनशीं दादाजी कहते थे - "दुनिया में दो किस्म के लोग होते हैं - रायचंद और करमचंद - करमचंद बनना और करमकचंदो से मित्रता रखना! " दादाजी को निराश करने का कोई मूड नही रहा.

अनूप जी का पीला वासंती चांद पढा था और पंकज जी का आडियो ब्लाग सुना फ़िर 27 जनवरी 2005 को अक्षरग्राम पर एक संभावना तलाशी -

कल्पना कीजिये कि आप जो भी अपने ब्लाग पे पेलते हैं वो आपने एक .mp3 मे भी रेकार्ड किया.
अब ऐसी सभी recorded .mp3 की स्ट्रीमिन्ग ठीक उसी तरह आन-लाईन रेडियो के रूप मे कर दो, जैसे हम नये ताज़े RSS Feed दिखा देते हैं चिट्ठा विश्व के माध्यम से. इस के लिये पहले .MP3s को किसि भी सर्वर पे चढा दो और उसकी लिन्क के साथ कुछ “RSS Feedनुमा” करो, या जो भी बेहतर उपाय हो ऐसा करने का!
Streamer कि लिन्क दे दो, जो रेडिओ जैसा बजेगा आपके प्लेयर पे, सबसे ताज़ा
updated .mp3 सबसे पहले! तो आपका हिन्दी ब्लाग रेडिओ बन गया. Headphones लगाओ और पीला वासन्ती चाँद अनूपजी की आवाज मे सुन लो - आवाज़ का उतार-चढाव भावनाऒ का बेहतर संप्रेशन. अगली .mp3 नरुलाजी की!

फिर सोचा संभव तो होना चाहिए ये करना और उसी दिन के आस-पास ही अतुल भाई ने घोषणा कर दी की हाँ सँभव है!

शुरु से अतुल भाई तकनीकी तौर पर छा गए - मेरी फाईल-नाम की जगह कडी के पते से बजवाने की गुजारिश भी पूरी कर दी ये एक खास टर्निँग पाईंट था, प्लेयर भी शानदार पेल दिया - प्लेयर जान् है पूरे प्रकल्प की - अब प्लेयर ने काफी सीन सँभाल लिया है - जहाँ से जो जी मे आए बजाओ!

अतुल भाई का प्लेयर बन कर तैयार हुआ और जीतू भाई अधीर भए - मुझे आदेश मिला कि पीछे का कोड लिखो - और फटाफट पहला चरण तैयार करो. भई पढूँ तो करूँ मुझे आटोमेटिक मीडिया फीड के बारे मे कुछ ज्यादा नही पता था! बोले नही यार पहले सादा काम करो - पहले प्रकल्प दिखाओ फाईल लोड करने का पेज बनाओ - मैने निवेदन पेला भई पेज बाद में गूगल का 1 जीबी ई-मेल कब काम आयेगा "बडे भाई, ई-मेल मे फाईल मँगवा और आटोमेटिक क्षमल बनवा कर सुनवा दूं ताबडतोड?" जीतू भाई की चेट क्या होती है प्रोजेक्ट मेनेजमेंट होता है खुले दिल से आईडिए इधर-उधर होते हैं. बात तय हुई नाम तय हुआ ब्लागनाद - बकायदा डेड-लाईन तय हुई, मेरे पास एक और प्रोजेक्ट अपना समय ले रहा था और उपर से दफ्तर! जीतू भाई उतरे मैदान में KISS - Keep It Simple Stupid का फंडा-झंडा ले के! बीटा रीलीज देख कर तबियत प्रसन्न है. अनूपजी के अंदाज में कहूँ तो - "आगे भी शुभ होगा!" या अपनी स्टाईल मे- "ये तो बस अंगडाई है - आगे और लडाई है!" :-)

अभी मामले खत्म नही हुए - आपको सुनाने के लिए एक और खुशखबरी तैयार हुई-हुई ही समझो - थोडा इन्तजार!

अतुल भई के आईडिए का मैं अनुमोदन करता हूँ - अनुगूंज को ब्लागनाद पर भी लाया जाए - या ब्लागनाद की तकनीक अनुगूंज जहां भी हो वहां मुहैया हो! - आईडिया मुझे पस‍ंद है पर तय करना मेरा काम नही है! मेरा स्वार्थ तो अनूप जी की आवाज में पीला वासंती चांद सुनना था - अनुग्रहित करो देव!

आपने मुझे इतने प्रेम से पढा और ब्लाग रेडिओ के स्वप्न को साकार कर दिया - आभार!

Sunday, February 27, 2005

टीवी पर साण्ड दिखा!

दिल ढूंढता है फ़िर वही फ़ुर्सत के रात दिन
बैठे रहे तसव्वुर-ए-जानां किए हुए

गालिब के इस शेर के बारे में गुलजार नें सही कहा है, के शब्द तो गालिब के हैं पर भावार्थ हर एक का अपना अपना. खुद गुलजार नें एक गीत तो क्या एक पूरी फ़िल्म, मौसम, का मूड ही जैसे इन दो पंक्तियों के बीच जमा दिया हो! मुझे ये पंक्तियां जीवन पूराण के साण्ड-काण्ड की याद दिलाती हैं.

आज कार में ये गीत दूबारा-तिबारा बजता रहा, शहर का तापमान जरा ठीक हुआ, एक जानी-पहचानी गंध की हवा चली और मुझे अतीत में बहा ले गई.

गर्मियां शुरु होने से कुछ पहले, आम तौर पर फ़रवरी में, एक दिन हवा की तासीर और गंध बदली महसूस होती है. इस गंध से परिचित लोग, उम्र के किसि भी पडाव में समीर-संदेश पढ लेते हैं, और भयभीत हो जाते हैं. ये दिन समय का एक मोड होता था - परिक्षा का मौसम या चालू भाषा में "फ़ाडू-दिन" शुरु हो जाते थे - हम थोडे सहम जाया करते थे. इस दिन के बाद मौसम बदल कर फ़िर चाहे दोबारा ज़रा ठंडा हो ले, अगले २-४ दिन में हर रात अलग-अलग प्रकार के सपने आते हैं - गणित के पर्चा हल ना होवे और फ़ेल होने के डर के मारे थोडी सी मुत्ती निकलने से ले कर स्वप्न-स्लखन तक की पूरी रेंज के सपनें!

वहीं दूसरी ओर , इस फ़रवरी महीने से लगाव पुराना है, अपने शहर में इस महीने का मौसम बडा ही सेक्सी लगता था. ये मौसम पारस्परिक सहमति से शीलग्रहण करने के लिए सबसे उपयुक्त होता है ऐसी मेरी व्यक्तिगत मान्यता है. तो इस महीने में हमारा तन-मन दोनो अपनी-अपनी वजह से तनावग्रस्त रहते थे. दिल घबराहट में समझ नहीं पाता था खून उपर को भेजूं या नीचे! मुट्ठीभर दिल समझदार था पर गुरुत्वाकर्षण बल के आगे झुक जाता.

दफ़्तर माने 'साधो ये मुर्दों का गांव' - दयनीय हैं देसी! ना सोच में तासीर ना तबियत में कोई रंग - काठ के टट्टू हैं इन से नही बता सकते जीवंत यादें उस शहर की जो अभी-अभी मानसपटल पर उभरीं थीं. शहर जो अब इतना बदल गया, किसि और का लगता है. २-३ साल बाद देश अपनी गली में जो ढूंढने जाओ वो तो नही दिखता, पर बदलाव यादों पर भी अतिक्रमण सा करता लगता है. सुना था ई-बे पे सब बिकता है, टाईम-मशीन खरीदने की ट्राई मारी, नही मिली. सच, दिल ढूंढता है फ़िर वही फ़ुर्सत के रात दिन. जबकी उम्र कोई ज्यादा नही हुई हमारी - रीसेन्टली में समय के बदलाव की चाल तेज हो गई है.

एक मित्र अपने शहर हो कर आया, फोन पे बोले यार एक बात कहता हूं - कभी गलती से खुदा से जवानी के दिनों वाली कोई दिख जाए,, ऐसी बद्दुआ मत मांगना, एक मेरेवाली दिख गई थी, जो पतली-पतंग सी बल खाती थी, टायर की दुकान हो गई! इस से तो खयालों मे सही थी.

यादों के सब जुगनू जंगल में रहते हैं
हम यादें जीने के दंगल में रहते हैं.

बीच चौराहे पर बेचारे की यादों का कत्ल हो गया!

ये मित्र, मुझे बहुत प्यारा था, जब हम जवानतर थे, इस इन्सान में चरित्र नामक कोई दुर्गुण नही था. बडा ही सजीव प्राणी था, बहुत ही गर्विला लंपट था. पूरा व्यक्तित्व दो आँखे और एक लिंग तक सीमित था. हमेंशा भरी-पूरी लडकियां पटा लिया करता. बडी मुश्किल से शेर-शायरी सुना-सुनू के एक चतुर्नेत्रा से दोस्ती की - मित्र और हम बाईक पे - (हां वही अंड-संड-प्रचंड वाली बाईक), सामने से वो अपनी काईनेटिक होंडा पर आ रही है, देखते ही दोनो गाडियां सडक किनारे रुकीं. हम २ मिनट बात करके वापस आए और ये बोला "अबे कमाल कर दिया यार .. क्या चीज पटाई है प्यारे चश्मे-बद्दूर!" मजेदार बात कन्या मुस्कुरा रही है. फ़िर बोला - तो कब खेलेगा? अब वो शर्मा कर निकल ली! और मैं सोच रहा था कि ये कन्या एक बुद्धीजीवी किस्म की पढाकू बन्दी होगी! उसके बाद पटाने के तरीके में स्ट्रेटेजिक चेन्ज की जरूरत महसूस होने लगी! फ़िर ये बोला "अबे वो उतनी भी नर्डी नही थी जितनी तू समझा, सही है बे!" - हर एक का अपना फ़ील्ड होता है "कैसे भांपा तूने यार?" - प्रेक्टिस मेक्स मेन पर्फ़ेक्ट. मैं 'स्पेकी' की कल्पनाओं मे खो गया - वो शायद अब २-३ बच्चों की अम्मा बन चुकी हो!

लिखते हुए अंतर्यामिणी से कहा "चश्मेबद्दूर का पता लगवाने का आज भी मन करता है, चाय अच्छी तेज बनाती थी, वैसे चश्में मे क्यूट लगती थी, यार चाय बना दो!" अंतर्यामिणी ने दयाभाव से देखा. किस्सा-ए-फ़ेल्युअरी-ए-इश्क-ए-औना-पौना सुना अंतर्यामिणी की सहानूभूती चाय स्वरूप प्राप्त की जा सकती है पर याद लिमिट में की जाए!

चाय पीते-पीते पता नहीं किस-किस के साथ पी चाय याद आती रहीं - मीठी, कसैली, कडवी. देर रात को चाए पीने का मजा कुछ और होता था - देर रात तक पढते और ब्रेक लेने लिए शहर के बस स्टेण्ड या रेलवे स्टेशन चाय पीने पहुंच जाते वैसे शहर में राजवाडा मतलब डाउन-टाउन में चाय नाश्ते की दुकानें खुली रहतीं. दो-ढई बजे होंगे रात के, एक बार एक चाय की दुकान पर गीत बज रहा था, अपना इस गीत से भी रोमान्टिक लगाव है -

पुकारो, मुझे फ़िर पुकारो
मेरी दिल के आईनें में
ज़ुल्फ़ें आज संवारो

पुकारो, मुझे फ़ुर पुकारो
मेरी ज़ुल्फ़ों के साए में
आज की रात गुज़ारो!

तो चाय-वाले को कहा गया, जब तक हम यहां हैं यही गाना बारबार बजेगा. वैसे ऐसे काम करवाने के लिए दादागिरी की जरूरत नही होती थी - आशिक-टाईप अगर चार यारों के साथ आग्रह कर रहे हैं तो अनुग्रहित करना होता था! अब साथ वाले दोस्त पक गए .. चाय वाले के सामने तो कुछ नही कहा रास्ते में खुन्नस निकाली! उस के बाद कभी ये गाना चित्रहार वगैरह पे भी देख लेते तो मुझे कोसते! जाने कहां गए वो दिन! कल टीवी पर साण्ड दिखा था, अब साण्ड से ईर्ष्या होती है!