eSwami's Feel Good Tantrum

I find it funny - 'Tantrum' sounds like singular form of 'Tantra'. I mean - its funny, if you know what Tantra really is all about! My English/Hindi blog is not about Tantra - Its about me, Baby! So deal with it! :)

Name: eSwami
Location: United States

An Indian living in USA.

Sunday, February 27, 2005

टीवी पर साण्ड दिखा!


दिल ढूंढता है फ़िर वही फ़ुर्सत के रात दिन
बैठे रहे तसव्वुर-ए-जानां किए हुए

गालिब के इस शेर के बारे में गुलजार नें सही कहा है, के शब्द तो गालिब के हैं पर भावार्थ हर एक का अपना अपना. खुद गुलजार नें एक गीत तो क्या एक पूरी फ़िल्म, मौसम, का मूड ही जैसे इन दो पंक्तियों के बीच जमा दिया हो! मुझे ये पंक्तियां जीवन पूराण के साण्ड-काण्ड की याद दिलाती हैं.



आज कार में ये गीत दूबारा-तिबारा बजता रहा, शहर का तापमान जरा ठीक हुआ, एक जानी-पहचानी गंध की हवा चली और मुझे अतीत में बहा ले गई.

गर्मियां शुरु होने से कुछ पहले, आम तौर पर फ़रवरी में, एक दिन हवा की तासीर और गंध बदली महसूस होती है. इस गंध से परिचित लोग, उम्र के किसि भी पडाव में समीर-संदेश पढ लेते हैं, और भयभीत हो जाते हैं. ये दिन समय का एक मोड होता था - परिक्षा का मौसम या चालू भाषा में "फ़ाडू-दिन" शुरु हो जाते थे - हम थोडे सहम जाया करते थे. इस दिन के बाद मौसम बदल कर फ़िर चाहे दोबारा ज़रा ठंडा हो ले, अगले २-४ दिन में हर रात अलग-अलग प्रकार के सपने आते हैं - गणित के पर्चा हल ना होवे और फ़ेल होने के डर के मारे थोडी सी मुत्ती निकलने से ले कर स्वप्न-स्लखन तक की पूरी रेंज के सपनें!

वहीं दूसरी ओर , इस फ़रवरी महीने से लगाव पुराना है, अपने शहर में इस महीने का मौसम बडा ही सेक्सी लगता था. ये मौसम पारस्परिक सहमति से शीलग्रहण करने के लिए सबसे उपयुक्त होता है ऐसी मेरी व्यक्तिगत मान्यता है. तो इस महीने में हमारा तन-मन दोनो अपनी-अपनी वजह से तनावग्रस्त रहते थे. दिल घबराहट में समझ नहीं पाता था खून उपर को भेजूं या नीचे! मुट्ठीभर दिल समझदार था पर गुरुत्वाकर्षण बल के आगे झुक जाता.

दफ़्तर माने 'साधो ये मुर्दों का गांव' - दयनीय हैं देसी! ना सोच में तासीर ना तबियत में कोई रंग - काठ के टट्टू हैं इन से नही बता सकते जीवंत यादें उस शहर की जो अभी-अभी मानसपटल पर उभरीं थीं. शहर जो अब इतना बदल गया, किसि और का लगता है. २-३ साल बाद देश अपनी गली में जो ढूंढने जाओ वो तो नही दिखता, पर बदलाव यादों पर भी अतिक्रमण सा करता लगता है. सुना था ई-बे पे सब बिकता है, टाईम-मशीन खरीदने की ट्राई मारी, नही मिली. सच, दिल ढूंढता है फ़िर वही फ़ुर्सत के रात दिन. जबकी उम्र कोई ज्यादा नही हुई हमारी - रीसेन्टली में समय के बदलाव की चाल तेज हो गई है.

एक मित्र अपने शहर हो कर आया, फोन पे बोले यार एक बात कहता हूं - कभी गलती से खुदा से जवानी के दिनों वाली कोई दिख जाए,, ऐसी बद्दुआ मत मांगना, एक मेरेवाली दिख गई थी, जो पतली-पतंग सी बल खाती थी, टायर की दुकान हो गई! इस से तो खयालों मे सही थी.

यादों के सब जुगनू जंगल में रहते हैं
हम यादें जीने के दंगल में रहते हैं.

बीच चौराहे पर बेचारे की यादों का कत्ल हो गया!

ये मित्र, मुझे बहुत प्यारा था, जब हम जवानतर थे, इस इन्सान में चरित्र नामक कोई दुर्गुण नही था. बडा ही सजीव प्राणी था, बहुत ही गर्विला लंपट था. पूरा व्यक्तित्व दो आँखे और एक लिंग तक सीमित था. हमेंशा भरी-पूरी लडकियां पटा लिया करता. बडी मुश्किल से शेर-शायरी सुना-सुनू के एक चतुर्नेत्रा से दोस्ती की - मित्र और हम बाईक पे - (हां वही अंड-संड-प्रचंड वाली बाईक), सामने से वो अपनी काईनेटिक होंडा पर आ रही है, देखते ही दोनो गाडियां सडक किनारे रुकीं. हम २ मिनट बात करके वापस आए और ये बोला "अबे कमाल कर दिया यार .. क्या चीज पटाई है प्यारे चश्मे-बद्दूर!" मजेदार बात कन्या मुस्कुरा रही है. फ़िर बोला - तो कब खेलेगा? अब वो शर्मा कर निकल ली! और मैं सोच रहा था कि ये कन्या एक बुद्धीजीवी किस्म की पढाकू बन्दी होगी! उसके बाद पटाने के तरीके में स्ट्रेटेजिक चेन्ज की जरूरत महसूस होने लगी! फ़िर ये बोला "अबे वो उतनी भी नर्डी नही थी जितनी तू समझा, सही है बे!" - हर एक का अपना फ़ील्ड होता है "कैसे भांपा तूने यार?" - प्रेक्टिस मेक्स मेन पर्फ़ेक्ट. मैं 'स्पेकी' की कल्पनाओं मे खो गया - वो शायद अब २-३ बच्चों की अम्मा बन चुकी हो!

लिखते हुए अंतर्यामिणी से कहा "चश्मेबद्दूर का पता लगवाने का आज भी मन करता है, चाय अच्छी तेज बनाती थी, वैसे चश्में मे क्यूट लगती थी, यार चाय बना दो!" अंतर्यामिणी ने दयाभाव से देखा. किस्सा-ए-फ़ेल्युअरी-ए-इश्क-ए-औना-पौना सुना अंतर्यामिणी की सहानूभूती चाय स्वरूप प्राप्त की जा सकती है पर याद लिमिट में की जाए!

चाय पीते-पीते पता नहीं किस-किस के साथ पी चाय याद आती रहीं - मीठी, कसैली, कडवी. देर रात को चाए पीने का मजा कुछ और होता था - देर रात तक पढते और ब्रेक लेने लिए शहर के बस स्टेण्ड या रेलवे स्टेशन चाय पीने पहुंच जाते वैसे शहर में राजवाडा मतलब डाउन-टाउन में चाय नाश्ते की दुकानें खुली रहतीं. दो-ढई बजे होंगे रात के, एक बार एक चाय की दुकान पर गीत बज रहा था, अपना इस गीत से भी रोमान्टिक लगाव है -

किशोर-
पुकारो, मुझे फ़िर पुकारो
मेरी दिल के आईनें में
ज़ुल्फ़ें आज संवारो

लता-
पुकारो, मुझे फ़ुर पुकारो
मेरी ज़ुल्फ़ों के साए में
आज की रात गुज़ारो!


तो चाय-वाले को कहा गया, जब तक हम यहां हैं यही गाना बारबार बजेगा. वैसे ऐसे काम करवाने के लिए दादागिरी की जरूरत नही होती थी - आशिक-टाईप अगर चार यारों के साथ आग्रह कर रहे हैं तो अनुग्रहित करना होता था! अब साथ वाले दोस्त पक गए .. चाय वाले के सामने तो कुछ नही कहा रास्ते में खुन्नस निकाली! उस के बाद कभी ये गाना चित्रहार वगैरह पे भी देख लेते तो मुझे कोसते! जाने कहां गए वो दिन! कल टीवी पर साण्ड दिखा था, अब साण्ड से ईर्ष्या होती है!

2 Comments:

Blogger प्रेम पीयूष said...

भाई साब , बढिया रंगबाजी हो गया , मस्त मालुम पङते है ।

11:40 PM  
Blogger Tarun said...

मस्त लिखा है रंगीला की उर्मिला की तरह॥

6:23 PM  

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