eSwami's Feel Good Tantrum

I find it funny - 'Tantrum' sounds like singular form of 'Tantra'. I mean - its funny, if you know what Tantra really is all about! My English/Hindi blog is not about Tantra - Its about me, Baby! So deal with it! :)

Name: eSwami
Location: United States

An Indian living in USA.

Friday, February 11, 2005

भोंगा पुराण - (तीन)

स्वीट-स्पाट क्या होता है?


स्वीट-स्पाट मतलब मधुर बिंदु, कमरे का वो स्थान होता है जहां पर सीधी और परावर्तित ध्वनियाँ सब से बेहतर सुनाई दें. मधुर संगीत को तमीज़ से सुनने के लिए इतने प्रपंच करने की जरूरत इस लिए पडती है कि हमारे कान पास की ध्वनी को जल्दी और ज्यादा सुनते हैं कोई उपाय नही निकला है कि आप कमरे मे कहीं भी बैठ कर एक से संगीत का आनंद ले सको. तो हमें ध्वनियों की आवाज को और परावर्तन को कमरे के हिसाब से जमाना पडता है - ताकी एक संतुलित माहौल बन सके.

संगीत सुनना और सिनेमा देखना बिल्कुल अलग अलग तरह की जमावट कि मांग करते हैं.
संगीत के लिए चहिए अनुभव गाने-बज़ाने वाल आपके सामने बैठ कर बजा रहे हैं और आप सुन रहे हैं. ध्वनियां साथ-साथ बज रही हैं पर हर एक की अपने आवाज का स्त्रोत अलग है निराला है. भव्य श्रव्य-मंच सज जाए.



सिनेमा के लिए चहिए अनुभव कि आप के आस-पास सब कुछ चल रहा है - वैसे तो सब आपके सामने पर्दे पर ही चल रहा है द्वी-ज्यामितीय पर्दे पर - मगर ध्वनी के माध्यम से त्री-ज्यमितीयता का भास हो- जब दृश्य में जरूरत हो. धमाकेदार आवाजें ऐसी आए की आपको लगे की सच मुच कोई बम या ज्वालामुखी फ़ट गया - चाहे पडोसी बिमार हो पर दिवारें हिल जाएं.



जैसे प्रकाश सीधी रेखा में गमन करता है परन्तु हम अवतल दर्पण की सहायता से उसे एक जगह केन्द्रित कर सकते हैं, स्पीकर्स की जमावट भी ऐसे की जा सकती है की हमें एक स्थान पर सबसे बेहतर आवाज आए. ध्वनी तरंगे हर दिशा मे जाती हैं परन्तु कोन जैसे स्पीकर्स उनको एक दिशा देने का प्रबंध करते हैं - आगे की ओर ही बढाने का - पीछे जाने वाली तरंगे बक्से में ही रह जर गुंजती हैं - आवाज तो अधिक होती है परन्तु आवाज का फ़ैलाव परावर्तित तरंगो द्वारा नही हो पाता - आवाज डब्बे से निकलती प्रतीत होती है - इस लिए एकाधिक स्पीकर्स का प्रयोग कर के हम जमावट बनाते हैं हर स्पीकर का मूह एक स्थान की तरफ़ को कर दिया जाता है. जमाव के कई तरीके हैं - संगीत सुनने के लिए २, २.१, ३, ३.१ स्पीकर्स का प्रयोग करते हैन सिनेमा के लिए ५.१, ६.१, ७.१ का प्रचलन है, रिकर्डिग के डोल्बी मानक बहुत कामयाब हुए हैं. आज-कल सभी इनके बारे मे जानते हैं. हर स्पीकर से निकलने वाली ध्वनियां अलग से स्पीकर तक भेजी और फ़िर बजाई जाती है. ये .१ का मतलब है वो बडा स्पीकर जो बस निचली तरंगे ही सुनाता है, धमाकेदार वाली. ध्वनियों की रिकर्डिग जमावट को ध्यान मे रख कर ही की जाती है ताकी सुनने वाले को दृश्य क हिस्सा ही बन जाने का अनुभव दिया जा सके. डोल्बी के अलावा कई मानक प्रयोग होते हैं - मोनो, स्टीरियो, टीऎचऎक्स - आज बच्चा-बच्चा इन से परिचित है.

एक बात और -

स्पीकर का चुनाव करने का एक महत्वपूर्ण नजरिया है उसकी उपयोगिता और आपका व्यक्तित्व - जी हां, आपके स्पीकर्स आपके व्यक्तित्व और पसंद के हिसाब से चुनें - कैसे?

कोई भी व्यक्ति ऐसा नही है जो या तो बस संगीत ही सुनता होगा या बस सिनेमा ही देखता होगा - सिनेमा भी संगीतमय होती है - खास कर हमारी देसी सिनेमा और हम देसी लोग तो संगीत प्रिय होते हैं.

फ़िर भी एक टेस्ट लो -

आप ज्यादा क्या करते हैं सिनेमा या संगीत?
अगर सिनेमा तो कैसी सिनेमा? शोर-शराबे वाली या संगीतमय!
अगर संगीत तो कैसा? धमाकेदार या शास्त्रिय या वाद्य प्रधान!

मैं वाद्य-प्रधान संगीत सुनता हूं मगर फ़िल्में धूम-धमाके वाली पसंद है अब एक ही सेट पर ये कैसे जमेगा?

मतलब आगे के साईड वाले स्पीकर पे खास जोर रहेगा और फ़िर वूफ़र भी हो दम दार - भले बीच-वाला स्पीकर और पीछे वाले स्पीकर थोडे कमतर हों तो भी मेरा ८०% काम चल गया समझो - तो आपको अपनी जरूरत के हिसाब से तय करना होता है.

अब हमारे एक मित्र जिन्हे डायलाग सुनने में ज्यादा मज़ा आता है साथ ही टीवी अधिक देखते हैं मगर धमकों से सर-दर्द हो जाती है - तो उन्हे एक शानदार बीच वाले स्पीकर की दरकार है भले और उस से मिलते जुलते ही - ज्यादा बडे नही, साईड वाले, छोटा वूफ़र काफ़ी रहेगा. पीछे ज्यादा बडे स्पीकर नही चाहिए.

मान लीजीए किसि भी विभाग में कमी-बेशी बर्दाश्त नही है - हर अनुभव आदर्श चाहिए. ठीक है, अब आप शान-दार स्पीकर्स, महंगे सराउण्ड स्पीकर्स और धमाकेदार वूफ़र से लैस हो गए मगर संगीत सुनते समय कंसर्ट का अनुभव भी चाहिए और सिनेमा के समय पूरा माहैल भी - अब आपको एक खास उपकरण की जरूरत होगी जो आप आपकी हर मुश्किल का हल कर देगा - सही पहचाना बंधुओं - अब आपको एक मल्टी-फ़ारमेट रिसीवर से अपने स्पीकर जोडने होंगे और ये आपको सुनने के लिए आदर्श परिस्थितियां बनाने के काम आएगा.

फ़िर भी आप कभी भी कहीं की ईट कहीं का रोडा भानूमती ने कुनबा जोडा वाला सेट-अप नही बनाएं - ना तो ऐसा सेट-अप दिखने में सुंदर होगा ना ही सुनने मे. सारे स्पीकर्स एक ही आकर के भी लिए जा सकते हैं - देखना ये होता है की आपकी अपनी जरूरत क्या है!

रिसीवर = प्री-एम्प्लीफ़ायर + एम्प्लीफ़ायर.
एम्प्लीफ़ायर = आवाज को बढाने का उपकरण
प्री-एम्प्लीफ़ायर = एकाधिक आवाज से स्त्रोत (टेप, सीडी, विडिओ, रेडिओ) से विद्युत संकेतों को ले कर हर स्पीकर को भेजे जाने वाले संकेत को अलग अलग कर के एम्प्लीफ़ायर को भेजने वला उपकरण.

डाल्बी या टीएचएक्स मानक में रिकर्ड किये गए ध्वनियों को बजाने के लिए स्पीकर की जमावट हमने देखी मगर जब तक अपनी तरफ़ से कुछ कम-ज्यादा खुराफ़त नही की तो मजा कैसा?

जमावट के साथ कमरे के आकर के हिसाब से, अपनी पसंद के संगीत और स्पीकर्स के हिसाब से खुराफ़ात कैसे करेंगे ये देखेंगे आगे! ये तो बस शुरुआत है.

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