Saturday, January 29, 2005

भोंगा पुराण - (एक)


स्पीकर्स को हिन्दी मे क्या बोलते हैं पता नही पर एक खास किस्म के लम्बे स्पीकर को हमारे गांव मे भोंगा बोला जाता है - खोपडी मे किसि और शब्द कि आम अनुपलब्धि होने से भोंगा से ही फ़िलहाल काम चलते हैं.

भोंगा या स्पीकर बडे काम की चीज है - ध्वनी उत्पन्न करने का वैद्युत उपकरण, अमेरिका मे बसे अधिकतर देसी अपने संगीतप्रेम का सबूत महंगे भोंगे खरीद कर देते हैं. गाने या बजाने का शौक एच १ धारी में कम ही पाया जाता है सो अपने उम्दा श्रोता होने कि छटपटाहट मे आम तौर पर देसी बोस कंपनी के स्पीकर्स पर वारी-बलिहारी होते देखे जाते है. उनकी टांग खिचाई ईत्मिनान से बाद मे कभी.


आम देसी जो दुनिया मे कहीं भी रहता हो उसके लिए भोंगा बस एक तरह का होता है - अलग अलग आकार का मगर एक तरह का.

आप किसि देसि से पूछो भोंगे कितने प्रकार के - बोलेगा वूफ़र, होर्न, ट्वीटर और मिड-रेंज. देसी का दोष नही है. डायनामिक स्पीकर ८०%-९०% मारकेट पे और हिन्दुस्तान की १००% मारकेट पे राज करते हैं!

डायनामिक स्पीकर्स मे आगे होता है एक कोन और पीछे होता है एक बडा चुम्बक, और एक क्वाईल. सुधी-जिज्ञासुओं को उनकी कार्य-प्रणाली पता ही है.


दो और जबर्दस्त किस्में हैं स्पीकर्स की - इलेक्ट्रोस्टेटिक स्पीकर्स और प्लेनर स्पीकर्स. इन मे भोंगा या शंकु नही होता! मगर इनमे ध्वनी आगे और पीछे दोनो तरफ़ से एक सी निकलती है! हां जनाब यह तो बस एक खासियत है. भाग दो में और लिखुन्गा उन पर!

इलेक्ट्रोस्टेटिक स्पीकर्स - एक महीन पर्दा जो आगे-पीछे हिल कर ध्वनी उत्पन्न करता है. ये पर्दा चुम्बकीय पदार्थ का बना होता है जो अपने ही आकार के विद्युतीय क्षेत्र में रखा जाता है. यह विद्युत क्षेत्र दो "स्टेटर्स" को इस झिल्ली जैसे महीन पर्दे के आगे और पीछे रख कर बनाया जाता है. पर्दा स्टेटर्स से समान दूरी पर बीच मे रखा जाता है. स्टेटर्स को बिजली के तारों से जोड कर बिजली प्रवाहित की जाती है.





स्पीकर को चलाने के लिए पर्दे पर इलेक्ट्रान का घना जमाव पावर सप्लाई का प्रयोग कर के किया जाता है. ध्वनि संकेत दोनो स्टेटर्स को भेजे जाते हैं, मगर एक खास तरीका होता है - दोनो स्टटर्स मे संकेत एक सा मगर १८० अंश पर उल्टा प्रवाहित किया जाता है. अतः जब एक स्टेटर मे संकेत क वोल्ट बढता है दूसरे मे घटता है तो बीच के पर्दे पर दोनो तरफ़ स्टेटर के चर्ज से उल्टे चार्ज जमा होते हैं इसका कुल जमा असर ये होता है की पर्दा एक साथ खीन्चा-धकेला जाता है. जब प्रवाह उलट होता है तो खीन्चाव का बल भी उलट दिशा मे जाता है. पर्दा हल्का और महीन होता है अतः उस्के हिलने से पास की हवा भी हिलती है और ध्वनी पैदा होती है.

प्लेनर स्पीकर - (स्वामी के चेहरे पर मुस्कान, आई लव यू जी, जिक्र उस परिवश का .., हाए ज़ालिम, आए हो मेरी जिंदगी मे तुम बहार बन के, वगैरह)

प्लनेर स्पीकर दिखने मे तो तकरीबन इलेक्ट्रोस्टटिक स्पीकर जैसे होते हैं मगर वो डायनामिक तरीके से काम नही करते अतः इनको अलग से बिजली दिये जाने की जरूरत नही होती. प्लेनर-चुम्बकीय मे विद्युत प्रवाह को धातु की रिबिन मे प्रवाहित करते है, इस रिबन के चारो और ताकतवर चुम्बक होते हैं - तो जमावट इलेक्ट्रोस्टेटिक स्पीकर से जरा उलट सी है. रिबन मे जब करंट प्रवाहित होता है तो आगे पीछे के चुम्बक उसे खीन्चते-धकेलते है क्योंकी दोनो तरफ़ अलग अलग चार्ज जमा हो जाता है रिबन पर. इस के कुल-जमा प्रभाव से ध्वनि उत्पन्न हो जाती है.

एक पांच फ़ुटिए की तस्वीर पेश है -


प्लेनर-मेग्नेटिक ड्राईवर मे कई फ़िट लम्बी रिबन लगाई जाती है और उच्च व मध्यम-रेंज की फ़्रीक्वेंसी को एक दम सही उत्पन्न करते हैं - जितनी कम फ़्रीक्वेन्सी की ध्वनी उत्पन्न करना होगी उतना ही रिबन का लम्बा रखना ज्यादा जरूरी होगा जिससे स्पीकर का आकार बडा रखना जरूरी होगा - इस लिए इन का वूफ़र जैसे प्रयोग के लिए उत्पन्न की गई फ़्रीक्वेन्सी के लिए कम प्रयोग होता है - शौकीनों के दूसरे कारगार उपाय होते हैं उनके बारे मे कभी जरूर लिखुंगा.

तो इतने बडे स्पीकर्स क्यों बनाए जाते है? क्या खास है इनके बारे मे और जो एक बार इनको सुन ले वो कभी कुछ और पसंद नही करता? कोई तो बात है! ढेर सारा पैसा और प्यार उंडेला जाता है इन पर, खास सेट अप मे सुना जाता है - क्यों?? अभी अगले अंक मे इन स्पीकर्स के बारे मे क्या-क्या लिखुंगा सोचा नही है - मगर भाग दो आयेगा जल्दी ही.

3 comments:

Jitendra Chaudhary said...

अच्छा लेख है, तकनीकी श्रेणी मे आता है, संपादित करके थोड़ा छोटा करो और आशीष को लिख भेजो.
यह लेख ज्ञान विज्ञान वाले ब्लाग पर छपने योग्य है.

और चाचा, कब तक ये छुपा छुपी का खेल चलेगा,
स्वामी जी अब तो अपना चोला उतारो, और असली नाम बताओ.

मिर्ची सेठ said...

स्वामी दादा,

देखिए बात तो आपकी सही है कि देसी बंधुओं को संगीत व उसकी समझ कम होती है व मंहगा बढ़िया समझ कर खरीदते हैं हम भी उन्हीं में से एक हैं। बोस की एक बात जो मुझे और कहीं नहीं नजर आती वह है, फॉम-फैक्टर यानि की आकार उस आकार में कोई और सस्ता सुन्दर व टिकाउ हो तो बतावें। भाई सिली वैली के एकल-शयनकक्ष में रहने वाले बड़े भोंपू घर तो लें आएं पर फिर खुद कहाँ जाएंगे।

आशीष said...

मैं इस लेख को ज्ञान-विज्ञान (vigyaan.blogspot.com) में डाल दूंगा। और यदि आप चाहें मैं आपको लिखने के लिये एक निमंत्रण भी भेजे देता हूं।